नीब करौरी बाबा की अनंत कथाएँ: महाराज जी तो केवल कार वालों के घर ही जाते हैं, मेरे जैसे गरीब के घर क्यों आयेंगे ?

नीब करौरी बाबा की अनंत कथाएँ: महाराज जी तो केवल कार वालों के घर ही जाते हैं, मेरे जैसे गरीब के घर क्यों आयेंगे ?

लखनऊ में लच्छीदा (लक्ष्मी दत्त त्रिपाठी) के मन में भी उत्कट अभिलाषा बनी रही कि महाराज जी उसके घर भी पधार कर प्रसाद पायें । पर वे यही देखते थे कि बाबा जी तो केवल बड़े बड़े लोगों के, या कार वालों के घर ही जाते हैं। मेरे जैसे गरीब के घर क्यों आयेंगे ?

घट घट की जानने वाले बाबा जी लच्छीदा से बहुत प्रेम मानते थे, परन्तु उसके घर न जाने का कोई और ही कारण था । भक्त के भाव के सम्मान में (तथा उसके अन्तर में उठी गलत अवधारणा मिटाने को भी) एक दिन महाराज जी उसके घर भी पहुँच गये ६-७ भक्तों के साथ | लच्छीदा मगन हो गये और महाराज जी को भोजन प्रसाद से तथा अन्य भक्तों को चाय, मिठाई, फल से तृप्त किया ।

जब सब कुछ हो गया आनन्द के साथ तो बाबाजी ने लच्छीदा को अलग बुलाकर पूछा - “तेरा कितना खर्चा हुआ ? अट्ठाइस रुपये पचास पैसे ?” और जब एक एक वस्तु मूल्य सहित गिनवाई गई तो पूरा हिसाब भी पूरे अट्ठाइस रुपये पचास पैसे का निकला !!

अब बाबा जी ने फिर पूछा “तेरे घर चाय में कितना खर्च होता है ?” हिसाब किया गया तो इस हेतु भी अट्ठाइस रुपये पचास पैसे बने !! (दूध, चाय, चीनी ।) तब बाबा जी बोले “अब बच्चों को चाय कहाँ से पिलायेगा ? ताई सों - हम तेरे घर नहीं आते थे !!”

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