नीब करौरी बाबा की अनंत कथाएँ: भारत वर्ष में धर्म की रक्षा माइयाँ ही करेंगी

नीब करौरी बाबा की अनंत कथाएँ: भारत वर्ष में धर्म की रक्षा माइयाँ ही करेंगी

अपनी शरणागत माइयों के उत्थान एवं उनकी दैहिक-दैविक भौतिक आपदाओं से मुक्ति हेतु बाबा जी महाराज ने नीति-धर्म आदि की सीमाओं की उपेक्षा करने में भी कोई संकोच नहीं किया और न इस हेतु अपने ऊपर आते आक्षेपों की ओर ही कभी ध्यान दिया ।

अपनी इन माइयों के भावों के वशीभूत हो महाराज जी उन्हीं के भावानुरूप अनेक रूप धारण कर उन्हें नाना प्रकार के अनुभवों एवं अनुभूतियों से परितुष्ट करते रहते थे और आज भी वही अनुभूतियाँ अपनी इन गोपिकाओं को (उन्हें धर्म का मुख्य अंग मानकर) उसी भाँति प्रदान कर रहे हैं उनके जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में । अपने श्री मुख से महाप्रभु ने अनेक बार कहा भी, “भारत वर्ष में धर्म की रक्षा माइयाँ ही करेंगी ।”

परन्तु अपनी इन माधुरी लीलाओं के माध्यम से महाराज जी ने इन माइयों को अपने श्री चरणों में मात्र प्रश्रय ही नहीं दिया, अपितु उन्हें अर्थहीन सांसारिकता से भी बड़े परिमाण में उपराम भी करा दिया। उन्हें (रामायण, भागवत वेदोपनिषद आदि में निहित सार) ढाई अक्षर वाले - प्रेम सच्चा स्वरूप हृदयंगम करा कर ।

फलस्वरूप इन माताओं-बहिनों के अन्तर में महाप्रभु इस तरह समा गये कि आज (भी) अपनी परम्परागत मान्यताओं के अनुसार विभिन्न देवी-देवताओं की (यहाँ तक कि राम, - शंकर और कृष्ण की भी) - पूजा अर्चना करते (तथा विभिन्न सांसारिक कार्यों के मध्य भी) ब्रज-गोपियों के अनुरूप इनके मन-मानस में बाबा जी महाराज ही छाये रहते हैं । बाबा जी से परम प्रेम प्राप्ति का इससे अधिक उत्कृष्ट प्रमाण और क्या हो सकता है ?

अपने श्री मुख से स्वयं भी अनेक बार कहा था—'यह आश्रम मैंने माइयों के लिये ही बनाया और अब महाराज जी के इसी लक्ष्य का विस्तार श्री माँ ने वीरभद्र (ऋषीकेश) आश्रम के रूप में कर दिया है ।

और अन्ततोगत्वा अपनी इन गोपिकाओं के प्रति सर्वदा सचेत बाबा जी ने वृन्दावन तथा कैंची में अनुपम आश्रमों की स्थापना इसी उद्देश्य से कर दी कि 'मेरी शरीर-लीला के उपरान्त भी इन माइयों को वही प्रश्रय, आनन्द और प्रेम इन आश्रमों के माध्यम से प्राप्त होता रहे जो मैं इन्हें देता रहा हूँ ।'

कैचीधाम में तो इसी लक्ष्य की पूर्ति हेतु अपनी इन शरणांगत गोपिकाओं को और भी पुष्ट आधार देने के लिए श्री माँ को प्रेरित कर अपना तत्व-पीठ मंदिर भी अपनी महासमाधि के ढाई वर्ष के भीतर ही स्थापित करवा दिया, जिसमें अपनी मूर्ति का प्रतिष्ठापन भी बाबा जी ने, (परिस्थितियों को सानुकूल मोड़ देकर) अपनी परम निष्ठ भक्त माता लीला माई के हाथों ही करवाना स्वीकार किया !!

बाबा जी महाराज जब तब माइयों के मध्य भी बैठा करते थे स्वतन्त्र रूप से। माइयाँ भी इसी प्रकार महाराज जी से बहुत अन्तरंगता पूर्ण व्यवहार करती रहती थीं निःसंकोच। परन्तु महाराज जी के प्रति उनके इस सरल, निश्छल, निष्कपट एवं प्रेमा-भक्ति युक्त भाव को कई लोग (कई मातायें भी, मैं भी) न समझ पाकर महाराज जी के प्रति गलत एवं विकृत अवधारणा बना बैठे थे।

(मद्रास के भक्त हुकुमचंद जी भी प्रथम दर्शन में कुछ माइयों को बाबा जी के चरण चाँपते देखकर कुछ क्षणों के लिये विचलित हो उठे थे।) प्रत्युत्तर में महाराज जी ने भी स्पष्ट कह दिया था कि, “मैं तो माइयों का ही बाबा हूँ ।” परन्तु साथ में यह भी कह दिया कि, “समय आने पर सब समझ जायेंगे |”

अन्ततः एक विचित्र सत्य और भी

यही हुआ भी । और अब तो बाबा जी महाराज की उक्त लीलाओं की परिणति उसी के विरोधाभास स्वरूप हो रही है। - आज श्री सिद्धी माँ को उसी प्रकार से घेरकर न मालूम कितना बड़ा पुरुष वर्ग (जिसमें वे भी शामिल हैं जो महाराज जी से उक्त संदर्भ के कारण तब परहेज रखते थे, तथा महाराज जी एवं माइयों के प्रति भ्रमित भी रहे) बैठा रहता है माँ से वही अपेक्षा लिये जिसकी कि (तब) माइयाँ बाबा जी से करती थीं यथा, अन्तर की आत्मिक शांति, भवसागर के दुःखों से निवारण, और साथ में श्री माँ में ही महाराज जी के स्वरूप का प्रतिबिम्ब दर्शन भी !!

वैसे भी, सांसारिक बुद्धि लेकर ऐसी आत्मानन्द विभूतियों के आचरण को समझ पाना सर्वथा असम्भव भी तो है इसी संदर्भ में बाबा जी महाराज ने वृन्दावन में संकेत भी दिया था कि, “बहुत खराब समय आ गया है । सर्वत्र पाखंड व्याप गया है। अनेक रूप के गुरु और साधू पैदा हो गये हैं। पर विश्वास इतनी सस्ती चीज नहीं है कि जिस-तिस पर लुटा दो ।” कहते रहते थे करना जानकर - 'गुरु पानी पीना छानकर ।' (सचेत रहने भर को ही यह संकेत था बाबा जी का रमा जोशी को )|

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