नीब करौरी बाबा की अनंत कथाएं: उनकी लीलाओं में दिखी हनुमान अवतार होने की झलक

नीब करौरी बाबा की अनंत कथाएं: उनकी लीलाओं में दिखी हनुमान अवतार होने की झलक

जय जय जय श्री भगवन्ता......तुम हो साक्षात् हनुमन्ता ।

बाबा जी महाराज ने जहाँ भी मंदिर स्थापित किये वे मुख्यतः हनुमान आराधना हेतु ही । साथ में जो भी अन्य देवी-देवताओं (दुंगा, विन्ध्यवासिनी देवी, वैष्णो देवी, वृन्दावनेश्वरी, श्रीराम जानकी, श्री लक्ष्मीनारायण, शंकर भगवान, गणेश जी आदि) के मंदिर बने, वे मूलतः जन-मानस की अभिरुचि की तुष्टि हेतु ही बने - संस्कार-बद्ध अथवा पारिवारिक और परम्परागत मान्यताओं से बँधे भक्तों की मनेच्छा पूर्ति हेतु। (वर्ष १६७३, जून माह में कैंची धाम में विन्ध्यवासिनी देवी के मंदिर को इगित कर महाराज जी ने मुझसे कहा भी था - तुम्हारे पहाड़ में देवी को मानते हैं, ताईसों हमने विन्ध्यवासिनी का मंदिर भी बनाय दिया ।

महाराज जी ने हनुमान जी के कितने मंदिर अन्य स्थानों में बनवाये, ज्ञात नहीं, परन्तु जानकारी के अनुसार उनके द्वारा मुख्यतः प्रथम हनुमान मूर्ति गुजरात में मौरवी नामक क्षेत्र के बबानियाँ ग्राम में जलाशय के किनारे प्रतिष्ठित हुई थी। इसके उपरान्त उनके द्वारा ग्राम नीब करौरी, (फर्रुखाबाद) में, बजरंगगढ़-भूमियाधार-कैंचीधाम-काकडीघाट (नैनीताल) में, परिक्रमा मार्ग (वृन्दावन ) मे, हनुमान सेतु (लखनऊ) में (दो मंदिर), पिथौरागढ़ (उ० प्र०) में, पनकी (कानपुर) में, जौनापुर (दिल्ली) में और तारादेवी (शिमला) तथा पोर्ट ब्लेयर (अन्डमान) में बनवाये गये ।

परन्तु अपने यश, अपनी ख्याति के प्रति सर्वथा उदासीन बाबा जी ने इन मंदिरों-आश्रमों में कहीं भी अपना नाम नहीं आने दिया और सभी मंदिरों-आश्रमों को हनुमान जी के नाम से निर्माण कराने के उपरान्त उनकी समुचित व्यवस्था कर उन्हें विभिन्न ट्रस्टों को सौंपते चले गये अपने को सर्वथा तटस्थ रखते हुये।

यह तो उनकी तथाकथित महासमाधि के बाद ही भक्तों ने इन मंदिरों-आश्रमों में बाबा जी महाराज का नाम जोड़ दिया जिसके ही फलस्वरूप हर मंदिर, हर आश्रम उनका सर्व-सिद्ध नाम धारण कर स्वयँ में उत्तरोत्तर प्रसिद्धि एवं सार्वभौम समृद्धि प्राप्त करने लगा, और उनका यही नाम, साथ-साथ, इन मंदिरों आश्रमों में आध्यात्मिक शक्ति का भी श्रोत बन गया । महाराज जी द्वारा हनुमान मंदिरों के ही निर्माण पर इस विशेष रूप से ध्यान दिये जाने के कारण भक्तों एवं जनता जनार्दन में उनके प्रति भिन्न-भिन्न प्रकार की धारणायें उत्पन्न हो गई ।

कोई उन्हें हनुमान भक्त तो कोई हनुमान सिद्ध और कोई उन्हें स्वयं एकादशरुद्रावतार हनुमान मानने लगे । बाबा जी महाराज की स्वयें की लीला-क्रीड़ाओं में भी हनुमान जी के सदृश ही आचरण दिखाई देता था - यथा, सूक्ष्म शरीर (मसक समान रूप धारण कर बन्द कमरों से लोप हो जाना, भीमकाय शरीर बना लेना, भार-हीन हो जाना, वानरी रूप धारण कर लेना, अत्यंत भारी हो बज-सम कठोर देह कर लेना, क्षण-मात्र में कहीं भी पहुँच जाना - आदि-आदि । (ऐसी लीलाओं के कुछ दृष्टांत आगे दिये जा रहे हैं। वस्तुतः बाबा जी महाराज शिव शक्ति के ग्यारहवें रुद्र-रूप हनुमान जी के ही अवतार हैं । जाना,

महाराज जी स्वयं भी भक्तों को सदा हनुमान आराधना हेतु विशेष रूप से प्रेरित करते रहते थे, और उनसे विशेषकर हनुमान चालीसा सुन्दरकाण्ड, बजरंग-बाण, हनुमान बाहुक, आदि का पाठ करवाते रहते थे तथा हनुमान जी की स्तुतियों पर आधारित पुस्तकें भी बाँटते-बँटवाते रहते थे।

बाबा जी महाराज द्वारा (माँ सीता से अष्ट सिद्धि नव निधि के अजर अमर दाता का अमोघ आशीर्वाद प्राप्त विभूति) हनुमान जी की आराधना हेतु विशेष बल दिये जाने के कई कारणों में एक कारण-विशेष यह भी रहा कि समस्त देवी देवताओं के मध्य केवल हनुमान जी ही संकट मोचन की क्षमता एवं उपाधि से विभूषित हैं । वैसे भी शंकर भगवान के अंशावतार हनुमान जी स्वयँ भी आशुतोष-अवढरदानी हैं और थोड़ी-सी आराधना से ही द्रवित हो भक्त की रक्षा करने एवं उसका संकट दूर करने (तथा भक्त को राम जी के सम्मुख करने) को तत्पर हो जाते हैं (जिसे ही वे राम काज का विशेष अंग मानते हैं ।)

और उनकी आराधना व कृपा प्राप्ति हेतु अनेकानेक विधाओं, अनुष्ठानों, मंत्रों एवं स्तुतियों के मध्य (जिनका अनुसरण एवं निर्वाह कर माना जनसाधारण के लिये सम्भव नहीं) केवल सुन्दरकाण्ड एवं हनुमान चालीसा ही, (विशेषकर हनुमान चालीसा) सबसे सरल सहज कुंजी है जो अनबूझे-अनपढ़ के लिये भी सर्वथा संभव है । और इसी कारण ही श्री माँ भी सदगुरु भगवान बाबा जी द्वारा प्रदत्त इस महामंत्रों वाली हनुमान चालीसा के पाठ को ही बाबा महाराज के सभी धामों में अन्य कार्यक्रमों की तुलना में विशेष महत्व देती हैं ।

कृष्णावतार चैतन्य महाप्रभु ने जिस तरह द्वापर के अवतार श्री कृष्ण की आराधना की पुनः जागृति हेतु भगवान कृष्ण के अनेक मंदिर बनवा दिये तथा श्री कृष्ण नाम कीर्तन को प्रधानता दिलवाई, और रामावतार सद्गुरु रामानन्द जी ने भी यही काम श्री राम-आराधना की पुनः जागृति हेतु किया, उसी प्रकार एकादशरुद्रावतार बाबा नीब करौरी जी महाराज ने भी (भगवान शंकर के अंशावतार) संकट मोचन हनुमान जी के विशाल-रूप एवं भव्य मंदिरों का निर्माण एवं उनमें हनुमान जी की सर्वांगसुन्दर मूर्तियों का प्रतिष्ठापन करवा दिया, तथा जनसाधारण के कष्टों के निवारणार्थ हनुमद-आराधना हेतु श्री हनुमान चालीसा को सबल-समर्थ माध्यम बना दिया ।

प्रसंगवश हनुमान चालीसा पाठ के प्रभाव का एक अनुभव श्री गण्डा ने यूँ सुनाया मेरे दोनों पैरों में अक्सर रात के वक्त अत्यंत पीड़ा-युक्त क्रैम्प्स (मरोड़) पड़ जाते थे और मैं विकल हो उठता था । अपनी अमरीका यात्रा के समय मैं इस हेतु दवायें भी ले गया था । एक रात बोस्टन शहर में पुनः ऐसा हो गया । दवाओं ने भी कोई असर न किया और मैं विकल हो रोने-रोने को हो गया । जब काफी समय हो गया और पीड़ा कम न हुई तो मैंने बड़े कातर भाव से श्री हनुमान चालीसा का पाठ प्रारम्भ कर दिया ।

३-४ आवृत्तियों के बाद ही मेरी पीडा कम होने लगी और धीरे-धीरे लोप हो गई । तब से जब भी मुझे पीड़ा होती है तो मैं श्री हनुमान चालीसा का पाठ प्रारम्भ कर देता हूँ और शीघ्र मुझे पीड़ा से मुक्ति मिलने लग जाती है । और अब तो ऐसे मरोड़ों की संख्या भी बहुत कम हो चली है पीड़ा की भीषणता भी कम हो गई और उसकी अवधि भी । मुझे पूरा विश्वास है कि इस बाधा तथा व्यथा से मुझे शीघ्र ही पूरी तरह मुक्ति मिल जायेगी केवल श्री हनुमान चालीसा की महोषधि नाशे रोग हरे सब पीरा, जपत निरन्तर हनुमद बलवीरा । (एस० डी० गण्डा, रिटायर्ड मैनेजिंग डाइरेक्टर - स्टेट बैंक)

(अनंत कथामृत के सम्पादित अंश)

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