नीब करोली बाबा की अनंत कथाएँ :  साधु के रूप में हनुमान सेतु मंदिर में आना, भगवान सिंह के प्राणों की रक्षा

नीब करोली बाबा की अनंत कथाएँ : साधु के रूप में हनुमान सेतु मंदिर में आना, भगवान सिंह के प्राणों की रक्षा

भगवान सिंह बचपन से ही अनाथों जैसा था। बाबा ने उसको अपनी सेवा में लेकर उस पर अनेक उपकार किये थे । और वृन्दावन हनुमान मन्दिर का पुजारी भी बना दिया था । उस अनपढ़ के मुँह से गीता का पाठ सुनवा कर बाबा ने उसकी प्रतिष्ठा भी बनवा दी थी । अन्त में बाबा ने उसे लखनऊ के संकटमोचन हनुमान मन्दिर का पुजारी बनाकर उसकी जीवन सुखमय बना दिया था ।

जब बाबा का महा प्रयाण हुआ तो वे अपने को अनाथ समझने लगा । वह अत्यंत दुखी हो गया क्योंकि उसके माता पिता भगवान सब बाबा थे । जब से बाबा का अस्थि कलश वहाँ पहुँचाया गया वे भी अपना जीवन समाप्त करने की सोचने लगा । उसने अगले दिन हनुमान सेतु से गोमती में कूदकर अपने प्राण देने का निश्चय कर लिया था ।

परन्तु अंतर्यामी करूणामयी बाबा से ये सब कहाँ छिप सकता था । अत: दूसरे दिन सुबह ही एक लम्बे बदन और गेरुआ वस्त्र डाले एक साधु ने मन्दिर में प्रविष्ट किया । उन्होंने भगवान सिंह को बाबा की दी हुई कण्ठ माला की और संकेत करते हुए कहा कि "ये माला तुम्हें कहाँ से मिली ?" उसने बाबा नीम करोली का नाम बताया । फिर अपने अस्थि कलश को इंगित करते हुए पूछा कि," इसमें क्या है ?" वे बताने लगा कि "बाबा की अस्थियाँ है ।"

वे तुरंत बोल उठे," झूठ, बिल्कुल झूठ। हम बाबा नीम करोली को अच्छी तरह जानते है ।हम सीधे अमरकण्टक से आ रहे है । हमें बाबा वहाँ टाट लपेटे दिखाई दिये । "हमने उनसे पूछा, "महाराज, आपने अपना कम्बल कहाँ छोड़ा ?" वे बोले, "हम उसे कैंची में छोड़ आये । अब हम एकान्त में भजन करना चाहते है ।" भगवान सिंह जानता था कि बाबा सर्वशक्तिमान है पर अस्थि कलश के बाद बाबा कैसे जीवित हो सकते है । वे साधु फिर बाबा के लहजे में बोला," हम नहाना चाहते है । हमारे लिये साबुन और पानी रख दो ।"

जब उसने साबुन पानी रखा को बाबा बोले," साधु साबुन नहीं लगाते ।" उस साधु के हाव भाव, बातें सब उसे बाबा की तरह लग रही थी । उसने देखा कि नहाते हुए भी वो साधु बच्चों की तरह हरकत कर रहा है जिस तरह बाबा करते थे । सब हरकतें बाबा की तरह देखकर वे भ्रमित हो रहा था । भोजन करने के बाद साधु जाने लगा तो भगवान सिंह ने पूछा ,"आप कहाँ ठहरे है ? आपके दर्शन कब हो सकते हैं ?" साधु बोला ," हम पास में अमीनाबाद के हनुमान मन्दिर में रहते हैं। वहाँ का पुजारी हमारी बड़ी सेवा करता है । तुम कभी भी हमसे मिल सकते हो । "

उसी दिन दोपहर बाद अपनी शंका मिटाने हेतु भगवान सिंह अमीनाबाद के हनुमान मन्दिर पहुँचा। उसे वहाँ कोई साधु दिखाई नहीं दिया । पुजारी से पूछने पर पता चला कि यहाँ कोई साधु नहीं रहता । तब भगवान सिंह को एहसास हुआ कि बाबा स्वंय उसके पास साधु वेश में आये और उसके जीवन समाप्त करने के संकल्प को समाप्त करवाने आये थे ।

जय गुरूदेव

आलौकिक यथार्थ

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