नीब करौरी बाबा की अनंत कथाएँ: महाराज जी की बातें उपहास न होकर भविष्य का लेखा ही सिद्ध हो जातीं

नीब करौरी बाबा की अनंत कथाएँ: महाराज जी की बातें उपहास न होकर भविष्य का लेखा ही सिद्ध हो जातीं

केवल उपहास-सी लगती महाराज जी की बातें उपहास न होकर भविष्य का लेखा ही सिद्ध हो जातीं । त्रिकालदर्शी-भविष्य दृष्टा बाबा महाराज को किसी भी व्यक्ति के जीवन में होने वाली घटनाओं की पूरी जानकारी तो रहती ही थी, पर कभी कभी अपनी मौज में उसे खुलकर भी व्यक्त कर डालते थे जिसमें उनकी अपनी कृपा भी समाहित रहती थी। (वैसे भी किसी को भी देखते ही बाबा जी उसकी पिछली पुश्तों का पूरा इतिहास जान जाते और कभी कभी व्यक्त भी कर देते !!)

डाक्टर प्रभात कुमार शर्मा मथुरा स्थित पशु-विज्ञान (वैटर्नरी) कालेज में शिक्षा पूर्ण कर फौज में भरती हो गये थे। अपने शिक्षा-काल में वे जब-तब बाबा जी के भी दर्शन करते रहते थे प्रेम-भाव से शिक्षा की अन्तिम परीक्षा में उनका एक परचा बुरी तरह खराब हो गया था। उत्तीर्ण हो पाने का प्रश्न ही न था ।

बहुत दुखी-उदास मन लेकर वे बाबा जी के पास आये तो अन्तर्यामी ने उन्हें देखते ही पूछा, “दुखी क्यों है ?” जब इन्होंने अपने परचे के खराब हो जाने के बारे में बताया तो बाबा जी तत्काल बोल उठे, “खराब कहाँ हुआ है ? वह तो सबसे अच्छा परचा हुआ है तेरा ।” इन्होंने सोचा कि केवल मेरा मन रखने को बाबा जी ने ऐसा कह दिया है । परन्तु जब नतीजा निकला तो उसी परचे में इन्हें सबसे अधिक अंक प्राप्त हुए थे !!

फौज में तरक्की करते ये मेजर बन चुके थे और शीघ्रातिशीघ्र ले० कर्नल बन जाना चाहते थे। बाबा जी के पुनः दर्शन होने पर इन्होंने पूछ दिया उनसे, “महाराज जी! मेरी तरक्की कब होगी ?” बाबा जी ने तत्काल उत्तर दिया, “अब कोई तरक्की-वरक्की नहीं होगी । तुझे तो कलेक्टर बनना है ।” फौज में रहकर कलेक्टर बन पाने का तो कोई प्रश्न ही नहीं उठता यही सोचते रह गये डा० शर्मा । तभी बाबा जी ने पुनः कह दिया, “तू अब कलेक्टर बनेगा ।” तरक्की नहीं होगी सुनकर मेजर शर्मा उदास हो लौट गये ।

परन्तु यह तो बाबा जी की वाणी थी - चरितार्थ कैसे न होती । कुछ ही काल बाद मेजर शर्मा का अपने अफसरों से ऐसा विवाद हो गया कि भविष्य में प्रोन्नति का मार्ग ही अवरुद्ध हो गया जिसकी परिणति इनके फौज से इस्तीफे के रूप में हो गई । पर कुछ ही काल के उपरान्त इन्होंने आर्मी कोटे से पी० सी० एस० परीक्षा में सफलता प्राप्त कर ली, और अन्ततोगत्वा कलेक्टर होकर ही सेवा-निवृत्त हुए ।

-- सदाकान्त

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