नीब करौरी बाबा की अनंत कथाएँ: मातृ वर्ग के प्रति विशेष कृपा-भाव

नीब करौरी बाबा की अनंत कथाएँ: मातृ वर्ग के प्रति विशेष कृपा-भाव

“नमो विश्वरूपाय विश्वस्थित्यन्त हेतवे । विश्वेशराय विश्वाय गोविन्दाय नमो नमः ।”

बाबा जी महाराज की भारहीन होकर बाल-रूप में मेरी गोद में बैठ जाने की लीला ने (जिसका मैं पूर्व में वर्णन कर चुकी हूँ) मुझे आराध्य देव की मातृवर्ग के साथ विशेष-रूप की अन्तरंगता लिये की गई लीलाओं पर (जिनके कारण मैं प्रभु के प्रति कुंठाओं से ग्रस्त थी) सार्थक विवेचन एवं उनका विश्लेषण करने हेतु एक नई प्रेरणा एवं दिशा दे दी । और तब एक एक कर उनके द्वारा मेरे तथा अन्य भक्त माइयों पर दया-कृपा-करुणा की उनकी विभिन्न लीलाओं में निहित मूलगत उद्देश्य मेरे अन्तर में नई नई अनुभूतियाँ देता चला गया । इन्हीं लीलाओं के मन्थन में मुझे रामायण एवं भागवत के अनेक लीला-प्रसंग भी स्मरण होने लगे तथा उनमें महाराज जी की इन भ्रामक-सी लगने वाली लीला-क्रीड़ाओं का पूर्ण रूपेण समन्वय भी होता चला गया ।

केवल दृष्टान्त रूप (सूक्ष्म में) :- वेदोपनिषद के अन्तर्गत वर्णित भगवान के सत्य रूप की आराधना (श्री सत्यनारायण जी की मूल कथा) में दिये गये जिन चार अध्यायों का मैं नित्य पाठ करती हूँ, उसके मध्य एक दिन महाराज जी की लीलाओं को मन-मानस में गुनती हुई पाठ में आये एक संदर्भ में मेरा मन उलझ गया और महाराज जी के लीला चरित्र की एक नई ही अनुभूति दे गया । प्रसंग था :—

भगवान के 'सर्वांग सुन्दरम् राम, सच्चिदानन्द लक्षणम्' में व्याप्त मोहिनी को (जिसकी मात्र झलकी पाकर ही वनवासी बैरागी मुनिगण भी विस्मृत हो जाते हैं। 'वभूः विस्मृता दृष्ट्वा मुनियो वनवासिनः) निहार कर देवताओं के मन में भी उत्कट अभिलाषा जाग उठी कि ऐसी माधुरी लिये भगवान राम का हम भी आलिंगन करें । और उन्होंने आलिंगामो वयँ रामो कह कर अपनी अभिलाषा भगवान से व्यक्त कर दी । उनके अन्तर की इस परम प्रीति को जानकर भगवान अत्यन्त तुष्ट और हर्षित होकर बोले, “हे देवताओ ! तुम्हारी इस प्रीति का पूर्ण आदर करता हूँ। परन्तु तुम इस रूप, इस देह से मेरा आलिंगन नहीं कर सकते। (अस्तु,) 'द्वापरे गोपिका भूत्वा, ममालिंगय भूः सुरा।" तुम (प्राकृत देह धरकर) द्वापर में गोपिकाओं के रूप में प्रगट होना और तब मेरे कृष्ण-रूप का आलिंगन कर (आत्मतृप्तो आत्मरतिः भाव से मुझमें आत्मरमण कर) अपनी आत्मतुष्टि कर लेना । "

अस्तु भक्तों, विशेषकर मातृवर्ग (जिसमें पाश्चात्य सभ्यता में रंगी भारतीय एवं विदेशी रमणियाँ भी शामिल थीं) का बाबा जी के ऐसे माधुर्य, ऐसी मोहिनी पर गोपी-भाव में न्योछावर हो उसमें डूब जाना स्वाभाविक था। अपने अपने भावों के अनुरूप ये मातायें बाबा जी महाराज में ही पुत्र, पिता, माता, बन्धु, सखा, परम गुरु, परम-इष्ट रूप के, तथा प्रणय एवं प्रणव स्वरूप में दर्शन पाती रहती थीं, और उसी के अनुरूप ही बाबा जी महाराज की पूजा-अर्चना करतीं उनसे आत्मतुष्टि प्राप्त करती रहती थीं।

यही हुआ कथा सर्वविदित है । देवताओं ने गोपिकाओं का स्वरूप धारण कर कृष्ण कन्हैया से अपने-अपने भावानुकूल आत्मरमण कर आत्मतृप्ति कर ली (परन्तु साथ में कृष्ण की अनेक विहार-लीलाओं में पात्र बनकर । वंशी भी केवल गोपिकायें ही सुन पाईं !! और केवल वे ही महारास में पात्र कृष्ण के प्रति अपने विशुद्ध प्रेम के कारण ही महारास की बन परमानन्द प्राप्त कर पाई !! लगता है आत्मरमण सखीभाव से ही संभव दर्शन भले ही सखा बनकर, भक्त बनकर, दास बनकर अथवा

प्रिया-प्रियतम भाव में डोलते रहने

देवता बनकर हो जायें। वृन्दावन में, जगन्नाथपुरी में, नवद्वीप में संत

महात्माओं के ऐसे ही 'सखी भाव -

का भी यही कारण है ।

साँवरे सलोने श्याम की सुन्दरता पर देवगणों का भी उक्त प्रकार से मोहित हो जाने का मूल कारण था श्यामसुन्दर के अंग अंग से फूटती मोहिनी, न कि केवल सुन्दरता। इसी मोहिनी शक्ति से ही सागर-मन्थन के अवसर पर भगवान ने स्वयं ही मोहिनी रूप से असुरों को मोह-पाश में उलझाकर देवताओं को अमृत प्राप्त करा दिया और इसी मोहिनी रूप पर कामारि शंकर भी डगमगा गये !! भस्मासुर को भी यही मोहिनी रूप धारण कर सुरपुर पहुँचा दिया गया।

यद्यपि श्याम सुन्दर के नख-शिख की सुन्दरता का भक्तों-कवियों ने अनेक प्रकार से बखान किया है, किन्तु सुन्दरता के मध्य मोहन की मोहिनी ही प्रथम स्थान पाती है। राम-विवाह के जेवनार के मध्य भी श्री राम के इसी मोहिनी भरे दृष्टिपात से आहत मिथिला की नारियाँ (जो अब तक विनोद में अयोध्यानरेश के लिए गालियाँ सुना रही थीं )

भूल गई अवधेश को नाम औ देने लगी मिथिलेश को गारी !!

बाबा जी महाराज में यही मोहिनी कूट-कूट कर भरी थी । प्रारम्भ में तो उनकी चमत्कारी लीलायें ही भक्तों को दृष्टिगोचर होती रहीं। परन्तु बाद में तो वय प्राप्ति के साथ (लगभग) दन्तविहीन, बावले-से, अधनंगे, अधगंजे, थुलथुल बेडौल शरीर तथा श्यामल त्वचा वाले बाबा जी महाराज के अंग-प्रत्यंग से यह मोहिनी, यह माधुरी, यह मनोहरता मानो किसी श्रोत की भाँति निरन्तर फूटती रहती थी। केवल भक्ति भाव भरी माताओं एवं बहिनों के लिए ही नहीं, वरन ऐसे ही भावुक पुरुष वर्ग के लिए भी परम आकर्षण का मूल बन गई ।

और प्रणतपाल बाबा जी महाराज भी ऐसे मातृवर्ग के साथ उन्हीं के भावानुरूप उन्हें अपनी लीला-माधुरी में सराबोर कर आत्मतृप्ति से परिपूर्ण करते रहते थे। कन्हैया की वंशी की तान में समाहित माधुरी और बाबा जी की मधु-मिश्रित वाणी में, चाहे वह प्रताड़ना भरी ही क्यों न हो, उनके लिये कोई अन्तर न था। बाबा जी के मुखमण्डल को निरन्तर निर्निमेष निहारते रहने में ही उन्हें गोपिकाओं के कृष्ण-रूप-दर्शन की, अथवा अयोध्यावासियों के श्री राम के मुखारबिन्द की रस-माधुरी की भाँति नैसर्गिक परमानन्द की ही सुखानुभूति प्राप्त होती रहती। ऐसे अवसरों पर बाबा जी महाराज तथा ऐसी निर्मल-मना माइयों के बीच कोई संकोच अथवा किसी प्रकार के दुराव-छिपाव का स्थान ही न होता। ये ही क्षण महारास की अनुभूति भी करा देते इन गोपिकाओं को

परन्तु यह तो मातृवर्ग का बाबा जी के श्री चरणों में समर्पित होने का केवल अनुपूरक कारण था, जिसकी अनुभूति मातृवर्ग को बाबा जी की उनके प्रति मूल रूप में विशेष कृपा-भाव के अन्तर्गत ही प्राप्त हुई। और यह कृपा-भाव भी तो श्री कृष्ण और श्री राम की उद्धार-लीलाओं का ही प्रतिबिम्ब है :

श्री कृष्ण की माधुरी लीलाओं में केवल देवकी, रोहिणी, यशोदा एवं रुक्मिणी ही न थीं। उनमें राधा भी थी, कुन्ती भी थी, द्रौपदी भी थी, विभिन्न आचरणों, रंग-रूप एवं वय वाली गोपिकायें भी थीं और साथ में कुब्जा भी थी, पूतना भी थी और भौमासुर द्वारा बन्दी १६१०० कुमारियाँ भी !!

श्री राम भी केवल कौशल्या, सुमित्रा, अनुसूया और सीता तक ही सीमित नहीं रहे मन्दोदरी भी जातुधानी भी !! उनके उद्धार लीला-क्षेत्र में अहिल्या भी आई, तारा भी, और शबरी भी साथ में कैकयी भी। पुन, लंका की

उक्त संदर्भों में वर्णित कथानकों से सभी परिचित हैं । उद्धार-लीलाओं में भी यशोदा, कौशल्या, सुमित्रा, अनुसूया, देवकी, शबरी बाबा जी महाराज की राम तथा कृष्ण सम ऐसी ही माधुरी एवं आदि के सदृश परम सुशीला, सद्गृहस्थ, भगवद्प्रेमी माइयाँ भी थी एक ओर (जिनका लक्ष्य था केवल महाराज में ही भगवान के सत्य रूप के दर्शन की प्राप्ति) तो दूसरी ओर स्वकर्मों से अभिशप्त, सामाजिक उत्पीडन की शिकार, पारिवारिक शोषण से दुखी अथवा लाँछित-उपेक्षित, शारीरिक मानसिक-आर्थिक कारणों से हीन-असमर्थ, अथवा अन्य कारणों से अपूर्ण अधूरी माँ-बहिनें भी इन उद्धार-लीलाओं की पात्र बनी रहतीं । इनमें सधवायें भी थीं, विधवायें भी, सुन्दर भी, कुरूप भी, भंग अथवा टेढ़े-मेढ़े अंगों वाली भी (कुब्जा), अमीर भी और गरीब भी थीं ।

और महाराज जी को अपनी इन गोपिकाओं पर दया कृपा की वर्षा हेतु उनकी वय, वर्ण, जाति, सम्प्रदाय आदि से कभी कोई सरोकार न रहा उनमें युवा भी थीं, अधेड़ (कई बच्चों वाली) भी, वृद्ध भी और अतिवृद्ध भी, कुलीन और (तथाकथित) शूद्र भी हिन्दू-मुसलमान, ईसाई स्वदेशी-विदेशी सभी । -

इन सबके जीवन में अपनी लीला माधुरी के माध्यम से प्रवेश कर (और कभी उन्हें बरबस अपनी ओर खींचकर भी) महाराज जी ने उनके (सासांरिक) दैन्य का शोषण कर एक नई जीवन ज्योति प्रदान कर दी उन्हें आत्मबल देकर एवं भगवान की ओर उन्मुख कर ।

और फिर अपनी लीलामाधुरी के ही माध्यम से उन सबके मन मानस में दीर्घ रूप में आसन जमाकर उन्हें परम-तत्व से परिचित भी करा दिया उनके साथ आत्म-रति द्वारा उनकी आत्मतृप्ति-आत्मतुष्टि कर उन्हें एक नई आत्मानुभूति करा दी। अपनी इन कल्याणमयी लीलाओं से उनके अन्तर में यही भाव सुदृढ़ कर दिया कि, 'मैं ही तुम्हारा पिता हूँ, मैं ही माता, मैं ही भ्राता, में ही सखा, मैं ही बन्धु और मैं ही सर्वस्व । जिनका संसार आश्रय-विहीन हो चुका था वे अब श्री चरणों में एक ऐसा प्रश्रय पा गईं जिसकी तुलना में संसार के समस्त भोग नगण्य से हो गये। इतने बड़े और ऐसे मातृवर्ग को इतना सुदृढ़ संबल संसार में और कहीं मिला भी तो न था. से। (रमा जोशी) - न घर में, न बाहर, न स्वजनों से और न परिजनों

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