नीब करौरी बाबा की अनंत कथाएँ: महाराज जी के शरीर से आने वाली अत्यन्त मधुर-मनोहारी नैसर्गिक सुगन्ध

नीब करौरी बाबा की अनंत कथाएँ: महाराज जी के शरीर से आने वाली अत्यन्त मधुर-मनोहारी नैसर्गिक सुगन्ध
वह स्थान अत्यन्त निकृष्ट था- चारों ओर भेड़-बकरी खच्चरों की बिष्ठा बिखरी पड़ी थी और जानवरों के मल-मूत्र से जमीन गीली थी। और ऐसी स्थिति में भी बाबा जी अपने आनन्द में थे !! तब भी गुफा की ऐसी दशा में भी।

ऐसे ही शान्ता जी के एक बार महाराज जी से हठ करने पर कि, "महाराज, कुछ चमत्कार दिखाइये", बाबाजी ने अंगूठे से अपनी हथेली रगड़कर इसी सुगन्ध से उन्हें पुनः सराबोर कर दिया !! और इलाहाबाद में भी एक दिन दादा के घर बाबा महाराज ने अपनी हथेली से ऐसी ही अलौकिक सुवास का प्रसार कर घर के सारे कमरों को भर दिया यहाँ तक कि फाटक के बाहर राह चलते लोगो को भी उस सुगन्ध ने आकर्षित कर लिया !!

अतिशयोक्ति-सी लगेगी यह बात कि यही नैसर्गिक सुगन्ध (अब) बाबा जी के प्रतीक कम्बल को प्रणाम करते समय भी प्राप्त होती है परन्तु कभी कभी ही जब ऐसा प्रणाम बाबा जी के प्रति भावातिरेक के मध्य - होता है ।)

इस सम्बन्ध में सबसे आश्चर्यजनक घटना तो लगभग ३० वर्ष पूर्व (१९६४ में) श्री माँ एवं जीवन्ती माँ के साथ घटित हो गई बद्रीनाथ में । महाराज जी इन्हें धर्मशाला में छोड़कर अन्यत्र चले गये थे। और जब बड़ी देर हो चुकी उन्हें गये तो, उनके बिना बेचैन, दोनों मातायें उन्हें ढूँढने निकल पड़। (तब बद्रीनाथ धाम में इतने भवन निर्मित नहीं हुए थे जितने कि अब हैं।

चारों ओर छोटी-बड़ी गुफाएँ एवं कन्दरायें ही थीं।) ये दोनों माताएँ बाबाजी को खोजते खोजते, गुफाओं-कन्दराओं के भीतर झाँकते जब एक बहुत बड़ी (कमरानुमा) गुफा में पहुँची तो वहाँ एक कोने में आसन जमाये, ध्यानस्थ बैठे बाबा जी को पा गई। परन्तु यह भी देखा कि, वह स्थान अत्यन्त निकृष्ट था- चारों ओर भेड़-बकरी खच्चरों की बिष्ठा बिखरी पड़ी थी।

और जानवरों के मल-मूत्र से जमीन गीली थी। और ऐसी स्थिति में भी बाबा जी अपने आनन्द में थे !! तब भी गुफा की ऐसी दशा में भी) श्री माँ-जीवन्ती माँ के गुफा के भीतर झाँकते और महाराज जी को पाकर उसमें प्रवेश करते ही वहाँ (दुर्गन्ध के स्थान पर) अत्यन्त मधुर-मनोहारी नैसर्गिक सुगन्ध की ही इनको अनुभूति हुई परम आश्चर्य के साथ !! (बाबा जी जो विराजमान थे वहाँ अपने अलौकिक तत्वों में !!)

ये तो थीं ऐसी अनेक अलौकिक घटनाओं तो बाबा महाराज के दिव्य शरीर से, उनके कम्बल से, वस्त्रों से तथा से कुछेक । अन्यथा उनके शयन के बिस्तरों से सदा ही एक अनिर्वचनीय सुवास प्राप्त होती थी जिसकी उपमा केवल एक अबोध शिशु के बदन की गन्ध से की जा सकती है। बालरूप भगवान के स्वरूप में ही तो बाबा जी सर्वदा स्थित रहते थे मूल भाव में

करारविन्देन्दु पदारविन्दं ।

मुखारविन्देन्दु विनवेशयन्तं ।।

बटस्य पत्रस्य कृतंशयानम् ।

बालं मुकुन्दं शिरसानमामि ।।

बाबा जी के अन्य रूप-स्वरूप तो उनकी लीलाओं के अनुरूप अंश-मात्र होते थे एकोहं वहुः श्यामः के अन्तर्गत । इस तथ्य की पकड़ विरलों के ही परम सौभाग्य की बात थी ।

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