नीब करौरी बाबा की अनंत कथाएँ: भगवान सदा ही अपने भक्तों-शरणागतों के हितों की रक्षा करते रहे हैं

नीब करौरी बाबा की अनंत कथाएँ: भगवान सदा ही अपने भक्तों-शरणागतों के हितों की रक्षा करते रहे हैं

भगवान सदा ही अपने भक्तों-शरणागतों के हितों की रक्षा करते रहे हैं। यहाँ तक कि आवश्यकता पड़ने पर वे स्वयं ही ऐसे भक्त का रूप-स्वरूप धारण कर उसका योग-क्षेम भी वहन करते रहे हैं। संत-भक्तों के जीवन में घटित ऐसी कई घटनायें प्रकाश में आई हैं ।

उदाहरणार्थ बिहार प्रदेश के एक महत्त्वपूर्ण रेलवे स्टेशन में एक परम वैष्णव राम-भक्त स्टेशन मास्टर नियुक्त थे । प्रारम्भ से ही राम-भक्ति में रेंगे ये संत-प्रकृति स्टेशन मास्टर साहब ब्राह्म बेला से ही राम जी की पूजा एवं उनके ध्यान में निमग्न हो जाते तथा भजनों में ही घंटों तल्लीन रहा करते थे। इस कारण सुबह ८ बजे के बजाय दस-साढे दस बजे तक ही अपनी ड्यूटी में पहुँच पाते थे। परन्तु राम कृपा से उनकी अनुपस्थिति के बीच कभी कोई चूक न होने पाई और न कोई नुकसान |

परन्तु एक दिन तो अति ही हो गई। उस दिन स्टेशन मास्टर साहब अपने भजन-ध्यान में इतने तल्लीन हो गये कि उन्हें ड्यूटी का ध्यान ही न रहा। और उसी दिन (तबकी) ईस्टर्न इंडिया रेलवे का एक अंग्रेज अफसर कलकत्ते से स्टेशन का मुआइना करने आ पहुँचा । अंग्रेजी राज था और अफसरशाही की सख्ती थी ।

परन्तु अफसर मुआइना कर संतुष्ट हो चला गया !! लोगों ने देखा कि स्टेशन मास्टर साहब भी अफसर को विदा करने चले गये । और जब ध्यान टूटने पर असली मास्टर जी स्टेशन पहुँचे तो सभी मातहत उन्हें बधाई देने लगे मुआइने की सफल सम्पन्नता पर कि “वाह साहब ! कितनी कुशलता से आपने सारे रेकार्डों का मुआइना करा लिया । अंग्रेज अफसर भी खुश हो चला गया ।"

मैंने कराया मुआइना ? "हाँ हुजूर । आप ही तो उसे सारे रिकार्ड एवं लीवर-पॉइंट आदि दिखाते रहे । ये देखिये, कितनी अच्छी रिपोर्ट लिख गया अफसर ।” ये आर्थ्यान्वित हुए वस्तुस्थिति समझने की चेष्टा करते रहे। रिपोर्ट का पहला वाक्य था मैंने आज स्टेशन का मुआइना किया । स्टेशन मास्टर स्वयँ वहाँ उपस्थित थे और उन्होंने मुझे सब रेकार्ड दिखाये.... आदि आदि। और अन्त में स्टेशन मास्टर की कार्यकुशलता पर प्रसन्नता और टिप्पणी !!

स्टेशन मास्टर साहब कुछ देर सोचते रहे “ओहो ! मेरे कारण मेरे प्रभु श्री राम को इतना कष्ट उठाना पड़ा !! मेरा रूप धर कर मुआइना कराते एक मानव की जी-हुजूरी भी करनी पड़ी !!” तभी उन्होंने मेज से कागज कलम उठाया, अपना स्तीफा लिखा और उसे मेज पर रख सीधे अज्ञात की ओर निकल गये । (स्वयँ बाबा जी द्वारा केहर सिंह जी को सुनाई गाथा ।)

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