नीब करौरी बाबा की अनंत कथाएँ: इसे दस रुपए दे दे ...

नीब करौरी बाबा की अनंत कथाएँ: इसे दस रुपए दे दे ...

चौथे शनिवार को राजामंडी में गाड़ी में चढ़ते वक्त पुनः जेब से रुपये निकल गये । उस दिन तो मुफलिसी के कारण अपने एक सहकर्मी, पाठक जी से २०) रु० उधार लेकर चला था मैं । चार रुपये टिकट में, चार रु० आधा किलो पेठे में, और कुछ रिक्शा-पान-चाय में खर्चे के बाद कुल ११)६० पैसे बचे थे जेब में ।

परन्तु वाह रे प्रभु ! उसी जेब से नोट ही नोट ले गया जेबकतरा और उन्हीं नोटों में लिपटा टिकट तथा ६० पैसे की रेजगारी सही सलामत रहे वृन्दावन तक बस का किराया ६० पैसे !! रास्ते में सोचता रहा कि लौटती सरकार से १०) रु० ले लूँगा और अगली बार लौटा दूँगा ।

आश्रम पहुँचा तो देखा कि बरामदे के तखत पर महाराज जी विराजे हैं, और आँख मूँदे, (बिना आवाज मुँह चलाते महाराज महाराज करते) अलीगढ़ के विशम्भर जी बैठे हैं बाबा जी के चरन चाँपते। पेठा अर्पण कर जैसे ही प्रणाम करने को झुका, विशम्भर जी से बोले, “इसे दस रु० दे दे ।” विशम्भर जी ने तत्काल मिरजई में हाथ डाल एक दस रुपये का नोट निकाल मेरी तरफ बढ़ा दिया ।

मेरे अहं को अजीब-सी लगी यह बात और मैंने बाबा जी से कहना चाहा, “महाराज", पर घट घट की जानने वाले तत्काल बोल उठे, कुछ जोर देकर, “ले लो, प्रेम (प्रेम) से दे रहा है ।” क्या करता, चुपचाप लेकर बाबा जी के चरणों में उसे छुवा जेब में रख लिया । फिर बोला, “महाराज, आज फिर जेब साफ हो गई ।” तपाक से बोल उठे सरकार, “ताई सों तो दिब्बाये हैं !!” क्या कहता-सोचा भी तो था कि महाराज जी से ले लूँगा १०) रु० ।

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