नीब करौरी बाबा की अनंत कथाएँ: भक्तों में प्रेम के सृजन हेतु भी महाराज जी की अपनी ही क्रिया-शैली थी

नीब करौरी बाबा की अनंत कथाएँ: भक्तों में प्रेम के सृजन हेतु भी महाराज जी की अपनी ही क्रिया-शैली थी

परन्तु यह सब कैसे-क्यों कर संभव हो पाता था ? जहाँ साधना-क्षेत्र में अन्तिम चरण (साधना का सुफल) गुरु-पद अथवा प्रभु-पद प्रेम हुआ करता है, जिसकी प्राप्ति हेतु ही सारी क्रियायें, सारे योग किये जाते हैं वहीं महाराज जी की पद्धति में कथित साधना प्रेम के स्तर से प्रारम्भ होती रही !!

पहले प्रेम फिर अन्य क्रियाएँ जो स्वतः ही शिष्य-भक्त के बिन प्रयास के ही संचालित होने लगती थीं ! (आज भी तो यही कर रहे हैं। महाप्रभु अपनी निर्गुण लीलाओं के माध्यम से !!) यद्यपि इस पद्धति में रिद्धि-सिद्धि की प्राप्ति अथवा कुण्डलिनी-जागृति, आदि सभी स्वतः ही गोंद हो जाते हैं उनका कोई महत्त्व नहीं रह जाता प्रेम की तुलना में तथापि ये स्थितियाँ भी (शिष्य-भक्त के बिना जाने ही उसके) अपेक्षा रहित विशुद्ध प्रेम केवल प्रेम - के फलस्वरूप और साथ में महाप्रभु की मौज की तरंग के प्रतिफल-रूप में स्वतः प्राप्त हो जाती थीं। (आज भी यह सत्य यथावत है ।)

और भक्तों के अन्तर में इस प्रेम के सृजन हेतु भी महाप्रभु की अपनी ही क्रिया-शैली थी। अपने अलौकिक मनमोहिनी लीलाओं में डुबो-डुबो कर, सराबोर कर, भक्तों को अपने ही में सब प्रकार से केन्द्रित कर यही भान करा देते कि, "मैं ही राम हूँ, मैं ही कृष्ण हूँ हनुमान हैं. शिव हूँ, आदि शक्ति-रूप हूँ मैं ही सब कुछ हूँ !!" (अनत कहाँ जाओगे उन्हें ढूँढने, उन्हें पाने ?) इस स्थिति में अपने को पाकर किसी का भी महाप्रभु के श्री चरणों के प्रति प्रेम उत्पन्न हो जाना स्वाभाविक हो जाता ।

परन्तु यह प्रेम भी महाप्रभु की ही देन होता। इस सत्य की सरकार स्वयं ही अपने श्रीमुख से पुष्टि करते रहते थे। वर्ष १९७० (जनवरी) में एक दिन मेरी पत्नी से पूछ बैठे, "तू हमसे प्रैम (प्रेम) मानती है?"पत्नी ने अपनी सहज स्वाभाविकता से अपने अन्तर की बात कह दी. हाँ महाराज। तब प्रभु पुनः पूछ उठे,"क्यों मानती है हमसे प्रैम ?" पत्नी क्या उत्तर दे इस गहन प्रश्न का? सोच में ही चुप रह गई कारण दूँढते। परन्तु महाप्रभु कब मानने वाले थे इस चुप्पी को ? उन्हें तो सत्य को उजागर, करना था। सो पीछे पड़ गये बता क्यों मानती है? बता। बता।" जब पत्नी किंकर्तव्यविमूढ़ हो चुप ही रहीं उनका श्यामल, दन्तविहीन मुखारविन्द निहारती तो स्वयँ बोल उठे, *क्योंकि हम तुमसे प्रैम मानते हैं !!"

अतः इस प्रेम-प्रक्रिया में जो कुछ भी होता वह मात्र महाप्रभु का ही हमारे प्रति उनके स्वयं के अपेक्षारहित प्रेम का ही परावर्तन होता । अपना इस प्रेम-तलैया में ही डुबो डुबोकर वे शिष्य-भक्तों की समस्त साधना उनके सारे योग स्वयं पूर्ण करा देते । महाराज जी की इस प्रेम-क्राड़ा ने आध्यात्मिक मार्ग के भक्तों को ही नहीं, वरन सांसारिकता में डुब शरणांगतों को भी इतने वेग से आत्मक्षेत्र में (प्रविष्ट करा) प्रगतिशील बना दिया कि वे अपने अनजाने ही एक कोने से दूसरे कोने में तथा एक सीढ़ी से दूसरी सीढ़ी पर पहुँच जाते।

जिस स्थिति की प्राप्ति हेतु यम-नियम, आसन, प्राणायाम, ध्यान-धारणा आदि की लकीर पीटते न मालूम कितने जन्मों की तपस्या, योग-साधना आदि की अनिवार्यता होती है, वही आध्यात्मिक स्थिति महाराज जी अपने भक्तों के अन्तर में इस ढाई अक्षर वाले प्रेम का बीजारोपण कर, उसका भरपूर सिंचन कर तथा उसे फल-फूल वाले वृक्ष का रूप-स्वरूप प्रदान कर भक्तों को नितान्त अल्पकाल में ही प्राप्त करा देते थे-उनके अनजाने ही !!

(परन्तु इस वृक्ष को हरा भरा, फल-फूल युक्त रखे रहना तो प्राप्तकर्ता की स्वेच्छा पर ही निर्भर होता।) उनकी यह प्रेम क्रीड़ा आज भी यथावत चल रही है पक रूप में और भी नये-नये भक्तों को भी अपनी प्रेम तलैया में डुबोकर ।

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