नीब करौरी बाबा की अनंत कथाएँ: बद्रीनाथ मार्ग के हनुमान चट्टी में कीर्तन करते हनुमान जी की स्थापना

नीब करौरी बाबा की अनंत कथाएँ: बद्रीनाथ मार्ग के हनुमान चट्टी में कीर्तन करते हनुमान जी की स्थापना

वृन्दावन आश्रम में महाराज जी के सम्मुख बैठी श्री माँ की दृष्टि एकाएक दीवार में टंगी एक तस्वीर पर पड़ गई जिसमें हनुमान जी हाथों में करताल लिये राम-नाम कीर्तन कर रहे थे। तभी वे बोल उठीं “महाराज ! आपने हर जगह हनुमान जी की विभिन्न मुद्राओं में कहीं गदा और पर्वत लिये, कहीं अहिरावण को पैरों के नीचे दबाये, कहीं पर हृदय में सीताराम के दर्शन कराते, कहीं पर वीर-मुद्रा में मूर्तियाँ स्थापित करवाई हैं, परन्तु कीर्तन करते हनुमान जी कहीं भी स्थापित नहीं करवाये ।”

महाराज जी तत्काल बोल उठे, “ऐसी मूर्ति हनुमान चट्टी में स्थापित करवा देंगे ।” (हनुमान चट्टी में ही गँधमादन पर्वत को जाते वक्त भीम को हनुमान जी ने द्वापर युग में दर्शन दिये थे ।) वर्षों पूर्व कहे बाबा जी के ये मनसा-वाक्य वर्ष १९६१ मे २२ अक्टूबर (सोमवार) को साकार हो गये !! मद्रास के एक भक्त श्री अर्जुन दास आहूजा को (जिन्होंने बाबा महाराज के पूर्व में दर्शन कभी नहीं किये थे) श्री माँ ने महाराज जी के साथ हुई उक्त वार्ता सुनाई थी कभी।

तभी से आहूजा जी ने मन ही मन बाबा जी की इस वाणी को साकार रूप देने का संकल्प ले लिया था और माँ से आज्ञा प्राप्त कर उक्त कार्य सम्पन्न कर दिया हनुमान चट्टी में संकीर्तन-रत हनुमान जी की एक अत्यन्त रमणीक संगमरमर की मूर्ति प्रतिष्ठापित कर ।

अपनी वाणी तथा श्री माँ के प्रति इस भक्त की ऐसी निष्ठा देखकर महाराज जी ने भी अपना कौतुक कर दिया। अक्टूबर माह की उस भीषण ठंड में, जब कि आस पास की चोटियाँ हिम से ढक गई थीं, महाराज जी के निष्ठावान भक्तों का उस सुदूर क्षेत्र हनुमान चट्टी में जमघट-सा लग गया। तीन दिन के उस महोत्सव में मदहोश हुए बाल-वृद्ध, अतिवृद्ध, युवा-युवती द्वारा 'हनुमान जी, बाबा जी, बद्रीनाथ जी और श्री माँ' के जयकारों से आकाश मण्डल गुंजायमान होता रहा।

मनों की मात्रा में केसरिया हलुवा प्रसाद बँटता रहा आते-जाते सभी यात्रियों को सैकड़ों की संख्या में आये साधु-सन्तों ने और जनता ने सुबह-शाम भण्डारा प्रसाद पाया । एक अत्यन्त भव्य समारोह पूर्ण हवन-यज्ञ के साथ पूर्णाहुति हुई। (बाबा जी महाराज के ऐसे सभी कार्य सदा ही तो वृहद् जन समुदाय को भण्डारा प्रसाद पवा कर ही सम्पन्न होते रहे - हो रहे हैं। होते रहेंगे।) अर्जुनदास जी ने ही इन समस्त शुभ कार्यों को बड़ी निष्ठा, कार्य कुशलता, भक्ति-भाव एवं तन-मन-धन अर्पित कर पूर्ण किया।

इस संदर्भ में एक अत्यन्त रोचक तथ्य यह है कि वर्षों पूर्व हनुमान चट्टी में निर्मित इस मंदिर में जो हनुमान मूर्ति प्रतिष्ठित थी वह स्वतः ही सिंहासन के एक किनारे पर स्थापित थी, मानो 'अपने इस कीर्तन करते स्वरूप' के प्रतिष्ठापन हेतु हनुमान जी पहले से ही केन्द्र में उनके लिये जगह छोड़े हुए थे !! अतएव, उस प्राचीन मंदिर एवं उसमें स्थापित हनुमान जी को अपने इस नये स्वरूप को ग्रहण करने में कुछ अधिक इधर उधर करने की आवश्यकता न पडी !!

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