कैंचीधाम के मंदिर, आश्रम की स्थापना का योग

कैंचीधाम के मंदिर, आश्रम की स्थापना का योग

अब आया कैंचीधाम के मंदिर/आश्रम की स्थापना का योग । लगता है कि युग-युगान्तरों के परमपुरुष, त्रिकालदर्शी बाबा जी का पूर्व का ही संकल्प था कि उत्तराखण्ड के तथा आसपास के क्षेत्रों में बसे उनके पूर्वकालिक भक्तों/आश्रितों को उनके अपने प्रति प्रेमा-भक्ति के प्रतिदान स्वरूप एक अपूर्व भेंट देनी है, जिसके लिये उन्होंने पूर्व में ही कैचीधाम की स्थापना का मन बना लिया था ।

यद्यपि अपना प्रभाव अँचल तो बाबा जी ने अपने इन जन्म-जन्मान्तरों के भक्तों/आश्रितों के ऊपर बाद में (चौथे-पाँचवें दशक में) ही फहराया था, परन्तु इस भेंट की भूमिका धाम की स्थापना के २०-२१ वर्ष पूर्व ही वे सम्पन्न कर चुके थे !!

हुआ यूँ कि वर्ष 1942 में कैंची ग्राम निवासी, श्री पूर्णानन्द तिवारी (अब दिवंगत) पीछे छूट गये कुछ मुकद्दमे के कागजातों को लाने के लिये नैनीताल कचहरी से सवारी के अभाव में पुनः पैदल ही कैंची ग्राम लौट रहे थे । सन्ध्या होने को आ गई थी, फिर भी मन में सवारी पा जाने की आशा लिये वे हल्द्वानी-अल्मोड़ा रोड स्थित गेठिया नामक बस स्टेशन को पैदल उत्तर आये ।

परन्तु अंधेरा होने को आ गया पर कोई सवारी न मिल पाई। हताश हो वे पैदल ही कैंची ग्राम (लगभग १५-१६ कि०मी०) की और चल दिये । किन्तु मार्ग में खुफिया डांठ नामक स्थान के (तथाकथित) भूत से वे डरते रहे, और जब उस स्थान के करीब पहुँचे तो देखा कि पैसपेट पर कम्बल लपेटे एक स्थूलकाय शरीर विद्यमान है । देखकर वे बेहद डर गये कि भूत का सामना हो ही गया। पर उस व्यक्ति ने जब इनका नाम लेकर उनके इस तरह पैदल जाने का भी प्रयोजन बता दिया तो ये कुछ आश्वस्त तो हुये पर मन में शंका बनी रही।

फिर भी उन्होंने उस साधू-से लगने वाले व्यक्ति के चरण स्पर्श किये। केवल औपचारिकता वश साधू-महाराज ने तब कहा, “जा, डर मत, आगे ट्रक मिल जायेगा तुझे।” तिवारी जी ने उसी सशंकित भाव से, पुन: औपचारिकता वश पूछा, "महाराज, अब फिर दर्शन कब होंगे ?" (भारत में, विशेषकर पहाड़ों में साधू-जोगियों को वैसे ही महाराज शब्द से सम्बोधित किया जाता है। अस्तु,) तिवारी जी का प्रश्न सुनते ही तपाक से उत्तर मिला, *बीस साल बाद !! अब जा ।"

इस उत्तर से और भी अधिक सशंकित हुये तिवारी जी राम राम जपते आगे बढ़ गये परन्तु साधू महाराज की वाणी के अनुसार उन्हें कुछ ही दूर पहुँचने पर ट्रक भी मिल गया उन्हें कैंची तक हुँचाने को ! फिर भी उनके लिये यह घटना शीघ्र ही आई-गई हो गई । परन्तु ठीक बीस साल बाद तिवारी जी को उन्हीं के गाँव कैची में महाराज जी ने अपने वचनानुसार पुनः दर्शन दे दिये ! कैसे ?

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