बाबा की वो पहली दस्तक...एक साईं भक्त के जीवन की सच्ची कहानियाँ
बाबा लेखन के घर पर

बाबा की वो पहली दस्तक...एक साईं भक्त के जीवन की सच्ची कहानियाँ

बाबा और मेरे बीच पनपी निकटता कोई पहली नजर के प्रेम जैसी बात नहीं है लेकिन कुछ कुछ होता है जैसा मामला जरूर था। यकीनन बीस साल तो हो ही चुके हैं, जब मैंने पहले पहल बाबा की तस्वीरें देखी थी। कहां ? शायद बिल्कुल ही असामान्य ढंग से। मेरी मुंबई वाली सुधा बुआ, जो बहुत ही सौम्य व्यक्तित्व की धनी हैं, के सूटकेस पर मैंने बाबा की तस्वीरें देखीं । बाबा में उनकी अगाध आस्था है।

मुझे याद है कि घर से विदा करते समय दही खिलाने या माथे तिलक लगाने की बजाय हमारे माथे पर विभूति टीका लगाती थी इस राख जैसी वस्तु को देख कर मुझे कौतूहल तो होता लेकिन फिर बात आई-गई हो जाती। अलबत्ता, मेरा सारा ध्यान उनके लाए चॉकलेट और विदेशी चोक्लैट पर होता जिन पर मैं खूब हाथ साफ करता क्योंकि ये मुझे बहुत भाते थे ।

इस समय तक या कहूं कि जीवन की धारा ही मोड़ देने वाली इस घटना मे पर्व तक मेरे लिए धर्म का तात्पर्य केवल मात्र शिव थे मेरी धार्मिक आस्था का आरम्भ एवं इति शिव के ही एक अवतार मनकामेश्वर बाबा में थी। उनका प्राचीन मंदिर आगरा के रावतपाड़ा में है। मैं सोमवार का व्रत रखता और छात्रावास के साथियों के साथ प्रत्येक सोमवार इस मंदिर जाता, वहां सेवा करता और शिव के इस स्वरूप में मग्न हो जाता।

समय को पंख लग गए। तेजी से गुजरा वक्त का यह दौर मेरे जीवन का वह समय था, जब बाबा के मामले में कुछ विशेष तो नहीं घटा लेकिन सफलता के नए आयाम तय हुए व जीवन आगे बढ़ा । लेकिन बाबा से मिलन की पदचाप साफ व स्पष्ट सुनाई दी।

समय गुजरता गया और आगरा प्रवास एम.ए. (राजनैतिक विज्ञान) की परीक्षा के पूर्ण होते ही संपन्न हुआ। कुछ समय मैनपुरी रहने के बाद दिल्ली गया, आईएएस की तैयारी की पर मध्य में ही छोड़ कर मीडिया के महासमर में गाहे-बगाहे कूद गया। देश के अग्रणी मास कम्यूनिकेशन संस्थान-आईआईएमसी में कोर्स पूरा कर अखिल भारतीय स्तर पर प्रथम आया।

आईआईएमसी ने मेरे जीवन को ही बदल कर रख दिया। यह बदलाव भी कई तरह का रहा। मुझे शायद मेरी पसंद का रोजगार मिला। ऐसा कि जिससे मुझे आम जन के सरोकारों से जुड़ने का अवसर मिला। रोज़ी-रोटी का जरिया साथ में था ही। इस कार्य में शोहरत भी बराबर मिलती है। पर शायद सबसे बड़ा व महत्त्वपूर्ण लाभ मिला, सागरिका के रूप में जीवन-संगिनी का साथ । यहां पर सागरिका से पहली मुलाकात हुई थी। सादी व सौम्य उड़िया लड़की सागरिका ने सहर्ष श्रीमती दुबे बनने की राह पर कदम बढ़ाया।

समय को पंख लग गए। तेजी से गुजरा वक्त का यह दौर मेरे जीवन का वह समय था, जब बाबा के मामले में कुछ विशेष तो नहीं घटा लेकिन सफलता के नए आयाम तय हुए व जीवन आगे बढ़ा । लेकिन बाबा से मिलन की पदचाप साफ व स्पष्ट सुनाई दी।

जैसा कि वेद-पुराणों और धार्मिक ग्रंथों में उल्लेख मिलता है और श्री साई सच्चरित्र के आख्यानों में भी वर्णित है, मेरे मन कुछ और है, दाता के मन कुछ और कुछ वैसा ही मेरे जीवन में भी घटित होना था। और यह बड़ी जल्दी घटित भी हुआ।

-- क्रमश कल...

(मोहित दुबे द्वारा लिखित पुस्तक : साईं, से साभार)

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