आगरा की सड़कें अब सफर का रास्ता कम और रोज का रणक्षेत्र ज्यादा लगती हैं। कहीं ऑटो चालक नियमों को ठेंगा दिखाते हैं, कहीं गलत दिशा में दौड़ते वाहन जान जोखिम में डालते हैं और कहीं मेट्रो निर्माण ने पहले से परेशान यातायात की कमर तोड़ रखी है। शहर में सुरक्षित आवागमन जैसे प्रशासन की प्राथमिकताओं की सूची से ही बाहर हो गया है। एमजी रोड, शहर की प्रमुख जीवनरेखा, पर बेतरतीब ऑटो संचालन और यातायात नियमों की धज्जियां उड़ने के कारण पाबंदियां लगाई गईं। लेकिन समस्या खत्म नहीं हुई। वह बस दूसरी सड़कों पर स्थानांतरित हो गई।
अब ऑटो मुख्य मार्गों के अलावा लिंक रोड और हाईवे तक को घेरते दिखाई देते हैं। लो-फ्लोर बसें चलाने से सार्वजनिक परिवहन की समस्या का दिखावटी समाधान जरूर हुआ, लेकिन यातायात की बुनियादी बीमारी जस की तस है। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि सड़क पर नियम तोड़ने वाला दिखाई देता है, लेकिन व्यवस्था की विफलता दिखाई नहीं देती। पुलिस और नगर नियोजन तंत्र दोनों इस अव्यवस्था के लिए जवाबदेह हैं।
आंकड़े इस अराजकता की भयावह तस्वीर पेंट कर रहे हैं। वर्ष 2024 में आगरा जिले में 1,223 सड़क दुर्घटनाएं दर्ज हुईं और 586 लोगों की जान गई। यानी औसतन हर दिन लगभग चार दुर्घटनाएं और एक से अधिक मौतें। गलत दिशा में वाहन चलाना, लाल बत्ती पार करना, तेज रफ्तार, मोबाइल पर बात करना और दोपहिया वाहनों पर तीन सवारियां बैठाना आम बात है। पुलिस चालान काटती है, लेकिन उसका असर कितना है, यह सड़कें रोज बता देती हैं। कार्रवाई अक्सर छिटपुट होती है। ब्लैक स्पॉट पर लगातार निगरानी, लाइसेंस निलंबन और वाहन जब्ती जैसे कठोर कदम विरले ही दिखाई देते हैं।
आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे का अनुभव भी आंखें खोलने वाला है। 2021 से 2025 के मध्य तक 7,000 से अधिक दुर्घटनाओं में आधे से ज्यादा मामलों में चालक की थकान एक प्रमुख कारण रही। सवाल उठता है कि सड़क सुरक्षा को लेकर निगरानी और जागरूकता व्यवस्था आखिर कितनी गंभीर है?
आगरा में मेट्रो निर्माण यातायात सुधार की उम्मीद लेकर आया था। लेकिन निर्माण की धीमी गति, लंबे समय तक खुले पड़े कार्यक्षेत्र, संकरे डायवर्जन और जगह-जगह टूटे मार्गों ने स्थानीय यातायात को बेहाल कर दिया है। शुरू में ही समझदार लोगों ने अंडरग्राउंड मेट्रो रेल नेटवर्क की डिमांड की थी, मगर लागत कम करने के चक्कर में सारे शहर की यातायात व्यवस्था भंग कर दी।
अब, जहां पांच मिनट में पहुंच जाना चाहिए, वहां 20-25 मिनट लगना अब सामान्य बात है। कई जगह सड़क का एक बड़ा हिस्सा बैरिकेडिंग में घिरा है और बची हुई सड़क पर ऑटो, ई-रिक्शा, दोपहिया, कार और बसें एक-दूसरे को रास्ता देने से कतराते हैं।
मेट्रो जैसी बड़ी परियोजना के लिए कुछ समय की परेशानी समझी जा सकती है। लेकिन तैयारी और निर्माण की समयसीमा के बीच तालमेल न हो तो असुविधा यातना बन जाती है। निर्माण स्थल की सफाई, बैरिकेडिंग, डायवर्जन की स्पष्ट सूचना और वैकल्पिक मार्गों का बेहतर प्रबंधन जरूरी है। शहर को यह जानने का अधिकार है कि कौन सा काम कब पूरा होगा और देरी क्यों हो रही है।
आगरा की आबादी लगभग 30 लाख तक पहुंच चुकी है। इसके अलावा हर वर्ष करोड़ों पर्यटक ताजमहल और अन्य ऐतिहासिक स्थलों को देखने आते हैं। दशकों पहले की आबादी और यातायात को ध्यान में रखकर बनी सड़कें अब इस बोझ के सामने छोटी पड़ रही हैं।
पीक आवर में कई प्रमुख मार्गों पर वाहन गति लगभग 15 किलोमीटर प्रति घंटा तक गिर जाती है। जाम केवल समय नहीं खाता, ईंधन और उत्पादकता भी निगलता है। एक अनुमान के अनुसार यातायात जाम, अतिरिक्त ईंधन और समय की बर्बादी से शहर को हर साल लगभग 500 करोड़ रुपये का आर्थिक नुकसान होता है।
पर्यटक भी इस अनुभव को लेकर अच्छी यादें लेकर नहीं लौटते। ताज देखने आए व्यक्ति को अगर आधा दिन सड़क पर फंसे रहना पड़े, तो विश्व धरोहर शहर की छवि पर भी सवाल उठता है।
जाम के साथ जहरीली हवा का बोनस
यातायात की समस्या केवल समय और धैर्य नहीं निगलती। यह हवा को भी जहरीला बनाती है। वाहनों से निकलने वाला प्रदूषण शहर के PM2.5 में महत्वपूर्ण योगदान देता है। सड़क की धूल इसका बड़ा हिस्सा हो सकती है, लेकिन यातायात ऐसा स्रोत है जिस पर प्रशासन तत्काल नियंत्रण कर सकता है। सर्दियों में प्रदूषण का स्तर खतरनाक सीमा तक पहुंच जाता है। चौराहों पर घंटों खड़े वाहन धुआं छोड़ते रहते हैं और पैदल चलने वाले उसी हवा में सांस लेते हैं। बच्चे और बुजुर्ग इसकी सबसे बड़ी कीमत चुकाते हैं। ताजमहल की सुरक्षा के लिए ताज ट्रेपेजियम जोन बनाया गया था। लेकिन अगर ताज के आसपास का यातायात ही प्रदूषण का बड़ा स्रोत बना रहे, तो केवल कागजी संरक्षण से विरासत नहीं बच सकती।
इलाज मुश्किल नहीं, इच्छाशक्ति चाहिए
आगरा को किसी चमत्कारी यातायात योजना की जरूरत नहीं है। जरूरत है नियमों के लगातार और निष्पक्ष पालन की। तेज रफ्तार, गलत दिशा, लाल बत्ती तोड़ने और खतरनाक ड्राइविंग पर नियमित कार्रवाई हो। लाइसेंस निलंबन और वाहन जब्ती जैसे कदम वास्तव में लागू हों। सड़कों पर फुटपाथ, स्पष्ट जेब्रा क्रॉसिंग, बेहतर संकेतक और सुरक्षित पैदल मार्ग बनाए जाएं। सार्वजनिक परिवहन को मजबूत करना होगा। कुछ लो-फ्लोर बसें समस्या का समाधान नहीं हैं। उच्च आवृत्ति वाली विश्वसनीय बस सेवा, व्यवस्थित ऑटो और ई-रिक्शा स्टैंड तथा बेहतर पार्किंग व्यवस्था निजी वाहनों का दबाव कम कर सकती है।
हर सार्वजनिक निर्माण में भी समयसीमा और जवाबदेही तय होनी चाहिए। हर निर्माण स्थल पर स्पष्ट डायवर्जन, पर्याप्त रोशनी, पैदल यात्रियों के लिए सुरक्षित रास्ता और नियमित यातायात प्रबंधन अनिवार्य होना चाहिए। कैमरा आधारित निगरानी, स्मार्ट सिग्नल, रियल-टाइम ट्रैफिक मॉनिटरिंग और तेज आपातकालीन प्रतिक्रिया व्यवस्था अब विलासिता नहीं, आवश्यकता है। भारी वाणिज्यिक यातायात को शहर के भीतरी हिस्सों से बाहर रखने के लिए उपलब्ध बाईपास और एक्सप्रेसवे का अधिक प्रभावी इस्तेमाल किया जा सकता है।
आगरा का ट्रैफिक संकट किसी दैवी आपदा का परिणाम नहीं है। यह वर्षों की प्रशासनिक उदासीनता, कमजोर प्रवर्तन, खराब नियोजन और अधूरे समन्वय का नतीजा है। शहर को जाम से निकालना असंभव नहीं है।
-- बृज खंडेलवाल