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View Point: Empty pockets of the middles class take the shine off the GDP bliss

नज़रिया: आम आदमी की खाली जेब ने फीकी की जीडीपी की चमक
4 September 2026 by
thenewsagency

 

भारत की अर्थव्यवस्था चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में 7.8 फीसदी की रफ्तार से बढ़ी है। सरकार के लिए यह निश्चित रूप से उत्सव का विषय है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर उनके मंत्रियों तक ने इसे भारत की मजबूत होती अर्थव्यवस्था का प्रमाण बताया है। आंकड़ों के मुताबिक अप्रैल-जून 2026 में वास्तविक GDP वृद्धि 7.8 फीसदी रही, विनिर्माण 9.2 फीसदी और निजी उपभोग 7.1 फीसदी बढ़ा। सरकार यह भी बता रही है कि भारत दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में सबसे तेज गति से बढ़ रहा है।

लेकिन किसी भी लोकतंत्र में आर्थिक विकास की कहानी केवल एक आंकड़े से पूरी नहीं होती। GDP का बढ़ना अच्छी खबर है, लेकिन असली सवाल यह है कि इस वृद्धि का लाभ किसे मिला? देश की कुल अर्थव्यवस्था बड़ी हुई तो क्या आम आदमी की आमदनी भी उसी अनुपात में बढ़ी? क्या मजदूर की मजदूरी बढ़ी? क्या किसान की क्रयशक्ति बढ़ी? क्या युवा को बेहतर रोजगार मिला? क्या परिवारों की बचत बढ़ी? क्या महंगाई और कर्ज का बोझ कम हुआ? और अगर इन सवालों का जवाब उत्साह पैदा करने वाला नहीं है तो फिर केवल 7.8 फीसदी GDP को आर्थिक खुशहाली का प्रमाणपत्र कैसे माना जाए?

GDP राष्ट्रीय उत्पादन का हिसाब है, नागरिक की जेब का नहीं। यही वह बुनियादी अंतर है जिसे आर्थिक उपलब्धियों के राजनीतिक प्रचार में अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। सरकार को यह अधिकार है कि वह GDP की तेज वृद्धि को अपनी उपलब्धि बताए, लेकिन जनता को यह अधिकार उससे भी बड़ा है कि वह पूछे कि राष्ट्रीय संपदा में उसकी हिस्सेदारी कितनी बढ़ी।

इस सवाल की शुरुआत कॉरपोरेट मुनाफे से कीजिए। भारतीय सूचीबद्ध कंपनियों के मुनाफे में पिछले कुछ वर्षों में जबरदस्त उछाल आया है। RBI के अध्ययन के मुताबिक सूचीबद्ध कंपनियों का कुल मुनाफा वित्त वर्ष 2020-21 के लगभग 2.5 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर वित्त वर्ष 2024-25 में करीब 7.1 लाख करोड़ रुपये हो गया। यानी चार वर्षों में मुनाफा लगभग तीन गुना हो गया। यह कॉरपोरेट क्षेत्र की मजबूती का संकेत है, लेकिन इसके साथ यह सवाल पूछना भी जरूरी है कि इसी अवधि में देश के आम श्रमिक, छोटे व्यापारी और निम्न आय वर्ग की वास्तविक आय कितनी बढ़ी।

कॉरपोरेट मुनाफे का बढ़ना बुरा नहीं है। मजबूत कंपनियां अर्थव्यवस्था के लिए जरूरी हैं। लेकिन अगर GDP की वृद्धि के साथ कॉरपोरेट मुनाफा असाधारण गति से बढ़े और श्रम की आय तथा घरेलू बचत उसी अनुपात में न बढ़ें तो विकास के वितरण पर सवाल उठना स्वाभाविक है। आखिर विकास का उद्देश्य केवल कंपनियों की बैलेंस शीट मोटी करना नहीं, बल्कि नागरिक की आर्थिक सुरक्षा बढ़ाना भी होना चाहिए।

शेयर बाजार की चमक भी इसी बहस का हिस्सा है। NSE और BSE पर सूचीबद्ध कंपनियों का कुल बाजार पूंजीकरण करीब 500 लाख करोड़ रुपये के आसपास पहुंच चुका है। यह भारत की पूंजी बाजार की ताकत बताता है। मगर बाजार पूंजीकरण देश की जनता की जेब में पड़ा पैसा नहीं है। शेयर बाजार में निवेश करने वाली आबादी और उससे लाभ पाने वालों का वितरण समान नहीं है। इसलिए Sensex और Nifty का रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचना अच्छी खबर जरूर है, लेकिन इसे आम भारतीय की आर्थिक समृद्धि का प्रमाण मान लेना तथ्यात्मक भूल होगी।

अब आइए सरकार के कर संग्रह पर। अगस्त 2026 में सकल GST संग्रह करीब 1.99 लाख करोड़ रुपये रहा और सालाना आधार पर इसमें 14.8 फीसदी वृद्धि हुई। सरकार के लिए यह निश्चित रूप से मजबूत राजस्व प्रदर्शन है। लेकिन GST का बड़ा हिस्सा खपत से आता है। नागरिक जितना खर्च करता है, उतनी ही आर्थिक गतिविधि और कर संग्रह की गुंजाइश बनती है। इसलिए GST के रिकॉर्ड संग्रह को केवल सरकार की सफलता के रूप में नहीं, बल्कि यह पूछने के अवसर के रूप में भी देखना चाहिए कि कर चुकाने के बाद आम नागरिक के पास बचता कितना है।

भारत में अप्रत्यक्ष करों का बोझ विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि GST की दर एक ही वस्तु खरीदने वाले करोड़पति और गरीब परिवार के लिए समान होती है। सरकार को राजस्व चाहिए और टैक्स जरूरी हैं, लेकिन आर्थिक न्याय का सवाल यह है कि कर व्यवस्था के बाद आय और क्रयशक्ति का वितरण कैसा है। यदि सरकार का खजाना लगातार भर रहा है और दूसरी तरफ परिवारों की बचत दबाव में है तो केवल कर संग्रह का बढ़ना नागरिक की समृद्धि का प्रमाण नहीं हो सकता।

सरकारी आंकड़ों में प्रति व्यक्ति आय भी बढ़ रही है। नई राष्ट्रीय आय श्रृंखला में प्रति व्यक्ति शुद्ध राष्ट्रीय आय मौजूदा कीमतों पर 2024-25 में लगभग 1.93 लाख रुपये बताई गई है। यह औसत है, वास्तविक जेब में पहुंचने वाली समान आय नहीं। औसत आय का अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि देश के प्रत्येक व्यक्ति के पास साल में 1.93 लाख रुपये खर्च करने के लिए उपलब्ध हैं। आय में असमानता इतनी महत्वपूर्ण है कि औसत आंकड़ा नीचे के तबके की वास्तविक आर्थिक स्थिति को छिपा सकता है।

सरकार के अपने Household Consumption Expenditure Survey का आंकड़ा इस अंतर को समझने में मदद करता है। 2023-24 में ग्रामीण भारत का औसत मासिक प्रति व्यक्ति उपभोग खर्च 4,122 रुपये और शहरी भारत का 6,996 रुपये था।  सवाल यह है कि जब देश की GDP खरबों डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने की दिशा में बढ़ रही है तो देश के करोड़ों लोगों की मासिक खपत अभी भी इतनी सीमित क्यों है?

यही आंकड़ा GDP के जश्न को एक अलग नजर से देखने को मजबूर करता है। एक तरफ हम दुनिया की सबसे तेज बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था होने का दावा करते हैं, दूसरी तरफ देश का बड़ा वर्ग अपनी आय का अधिकांश हिस्सा भोजन, किराये, शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन और जरूरी वस्तुओं पर खर्च करता है। विकास की असली कसौटी यही है कि GDP की वृद्धि किस हद तक नागरिक की आर्थिक स्वतंत्रता में बदलती है।

कर्ज की तस्वीर भी इसी बहस को गंभीर बनाती है। केंद्र सरकार की देनदारियां लगातार बढ़ रही हैं। सरकार का कर्ज अपने आप में कोई अपराध नहीं है; विकास के लिए उधार लेना दुनिया की हर सरकार करती है। लेकिन कर्ज का सवाल तब महत्वपूर्ण हो जाता है जब सरकार एक तरफ तेज विकास का दावा करती है और दूसरी तरफ भविष्य की आय का एक बड़ा हिस्सा पुराने कर्ज और ब्याज की अदायगी में जाना तय होता है। इसके अलावा परिवारों और व्यक्तियों का अपना कर्ज अलग है—गृह ऋण, वाहन ऋण, शिक्षा ऋण, व्यक्तिगत ऋण और क्रेडिट कार्ड का बोझ। इसलिए GDP बढ़ने के साथ यह देखना भी जरूरी है कि परिवारों की बैलेंस शीट मजबूत हुई है या कर्ज बढ़ा है।

बेरोजगारी का सवाल इससे भी बड़ा है। 7.8 फीसदी GDP वृद्धि तभी सामाजिक उपलब्धि बनेगी जब वह पर्याप्त और अच्छी आय वाले रोजगार में बदल सके। महज यह कहना पर्याप्त नहीं कि अर्थव्यवस्था बढ़ रही है। सवाल यह है कि उस वृद्धि से कितने स्थायी रोजगार पैदा हुए। कितने युवाओं को उनकी योग्यता के मुताबिक काम मिला। कितने लोग मजबूरी में कम आय वाले असंगठित काम में लगे हुए हैं। भारत के लिए रोजगार का प्रश्न इसलिए और गंभीर है क्योंकि देश की विशाल युवा आबादी तभी आर्थिक ताकत बनेगी जब उसे उत्पादक और सम्मानजनक काम मिलेगा।

महंगाई का सरकारी औसत भी इसी तरह सवालों के घेरे में आता है। जुलाई 2026 में खुदरा महंगाई 4.45 फीसदी रही।  यह आंकड़ा अपने आप में भयावह नहीं दिखता, लेकिन आम आदमी की महंगाई केवल CPI का औसत नहीं होती। उसके लिए स्कूल की फीस, इलाज, किराया, दूध, सब्जी, यात्रा, बीमा और रोजमर्रा की जरूरतों की कीमत महत्वपूर्ण होती है। सरकार को इसलिए यह बताना चाहिए कि वास्तविक आय की वृद्धि महंगाई को समायोजित करने के बाद कितनी हुई।

विदेशी निवेश की तस्वीर भी एकतरफा नहीं है। भारत में दीर्घकालिक FDI का संचयी प्रवाह बड़ा है और सरकार इसे अपनी सफलता के रूप में प्रस्तुत करती है। दूसरी तरफ विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों की भारतीय शेयर बाजार से भारी निकासी हुई है। FDI और FPI को एक मानना गलत होगा, क्योंकि दोनों की प्रकृति अलग है। लेकिन दोनों को साथ देखकर यह सवाल जरूर पूछा जा सकता है कि भारत में विदेशी पूंजी के व्यवहार में इतना उतार-चढ़ाव क्यों है और भारत को वैश्विक पूंजी के लिए और अधिक आकर्षक बनाने में क्या कमी रह गई है।

और अब सबसे दिलचस्प विरोधाभास सामने आता है। एक तरफ सरकार GDP की 7.8 फीसदी वृद्धि को भारत की आर्थिक ताकत का प्रमाण बता रही है, दूसरी तरफ प्रधानमंत्री नागरिकों से गैर-जरूरी सोना खरीदने, विदेश यात्राओं और विदेश में शादियों पर खर्च कम करने तथा घरेलू अर्थव्यवस्था को प्राथमिकता देने की अपील कर रहे हैं। देशहित में ऐसी अपील का अपना महत्व हो सकता है। विदेशी मुद्रा बचाना भी आर्थिक नीति का हिस्सा है। लेकिन सवाल यह है कि अगर अर्थव्यवस्था इतनी मजबूत और आत्मनिर्भर हो चुकी है तो नागरिकों की विदेश यात्रा या सोने की खरीद राष्ट्रीय चिंता का विषय क्यों बन रही है?

क्या आर्थिक महाशक्ति बनने का अर्थ यह है कि सरकार नागरिक को बताए कि उसे क्या खरीदना चाहिए और क्या नहीं? या फिर आर्थिक ताकत का वास्तविक अर्थ यह होना चाहिए कि नागरिक इतना समृद्ध हो कि वह अपनी पसंद से यात्रा कर सके, सोना खरीद सके, बच्चों को अच्छी शिक्षा दे सके और फिर भी पर्याप्त बचत कर सके?

यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि इन सवालों का मतलब यह नहीं है कि 7.8 फीसदी GDP वृद्धि झूठी है। सरकार ने GDP की नई श्रृंखला, नया बेस ईयर 2022-23 और नई गणना पद्धति लागू की है। सरकार का कहना है कि पुराने आंकड़ों में हुए बदलाव बेहतर डेटा और बेहतर पद्धति का परिणाम हैं, किसी आंकड़ा-हेराफेरी का नहीं।  इसलिए बहस को “GDP फर्जी है” जैसे राजनीतिक नारे में बदल देना भी गलत होगा।

लेकिन यही तो लोकतंत्र की खूबसूरती है। सरकार के आंकड़ों पर भरोसा किया जाए, फिर भी सवाल पूछे जाएं। 7.8 फीसदी को स्वीकार किया जाए, फिर भी पूछा जाए कि इसका वितरण कैसा है। कॉरपोरेट मुनाफे को उपलब्धि माना जाए, फिर भी पूछा जाए कि मजदूरी क्यों पीछे है। GST संग्रह को मजबूत माना जाए, फिर भी पूछा जाए कि कर देने के बाद परिवार की बचत कितनी है। शेयर बाजार की ऊंचाई पर गर्व किया जाए, फिर भी पूछा जाए कि कितने भारतीय वास्तव में उससे लाभान्वित हो रहे हैं।

असल सवाल GDP कितना बढ़ा, यह नहीं है। असली सवाल है-भारत कितना बदला?

अगर GDP बढ़ती है लेकिन बेरोजगार युवा नौकरी के लिए भटकता है, अगर कॉरपोरेट मुनाफा बढ़ता है लेकिन छोटे कारोबारी पर कर्ज बढ़ता है, अगर शेयर बाजार नई ऊंचाइयां छूता है लेकिन करोड़ों परिवारों की बचत कमजोर होती है, अगर सरकार का टैक्स संग्रह रिकॉर्ड बनाता है लेकिन परिवार अपनी आय का बड़ा हिस्सा जरूरी खर्च में खपा देता है, तो सरकार को केवल GDP का आंकड़ा दिखाकर संतुष्ट नहीं होना चाहिए।

भारत को केवल बड़ी अर्थव्यवस्था नहीं बनना है। उसे ऐसा देश बनना है जहां बड़ी अर्थव्यवस्था का लाभ नागरिक के जीवन में दिखाई दे। जहां GDP के साथ रोजगार बढ़े, मुनाफे के साथ मजदूरी बढ़े, टैक्स के साथ सेवाएं बेहतर हों, निवेश के साथ उत्पादन बढ़े, उत्पादन के साथ आय बढ़े और आय के साथ बचत भी बढ़े।

आखिर विकास का अंतिम लक्ष्य आंकड़ों की किताब में एक बड़ा GDP लिख देना नहीं है। विकास का अंतिम लक्ष्य यह है कि देश का सामान्य नागरिक अपने महीने का बजट बनाते समय डरता न हो, अपने बच्चे की फीस भरने के लिए कर्ज न ले, इलाज के लिए संपत्ति न बेचे, नौकरी जाने के डर में न जीए और भविष्य के लिए कुछ बचा सके।

GDP देश की अर्थव्यवस्था का आकार बताती है; लेकिन जनता की जेब बताती है कि उस अर्थव्यवस्था में उसका हिस्सा कितना है।

इसलिए मोदी सरकार को अब केवल यह बताने से आगे बढ़ना होगा कि GDP 7.8 फीसदी की दर से बढ़ रही है। उसे यह भी बताना होगा कि इस 7.8 फीसदी में आम आदमी का हिस्सा कितना है।

क्योंकि आखिरकार लोकतंत्र में सरकार का मूल्यांकन शेयर बाजार की ऊंचाई से नहीं, नागरिक की जिंदगी की ऊंचाई से होना चाहिए।

-- राजीव तिवारी 'बाबा'


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