काश चुनावी मैनेजमेंट गुरु मज़दूरों के कष्ट दूर करने में भी कुशल प्रबंधन दिखाते

कोरोना काल का सबसे विभत्स चेहरा बनकर ये सैलाब कहां से निकलता जा रहा है। प्रवासी मजदूरों की अनुमानित संख्या का अनुमान तक नहीं। तो फिर आप इनके कष्ट दूर करने का ख़ाका भी कैसे तैयार करेंगे। हांलाकि आपको मैंनेजमेंट गुरु कहा जाता है। चुनाव मैनेजमैंट मे आपका कोई सानी नहीं। ग़ौर फरमाइये हुज़ुर-

मानवतावादियों और पत्थर का कलेजा ना रखने वालों का कलेजा फाड़ देने वाले मजदूरों की लाचारी के दृश्य धरती को श्यमशान बन जाने की कल्पना से भी भयावह हैं। गरीबों की बेबस-लाचार आंधी थमने का नाम नहीं ले रही है। समाज के हर वर्ग की थाह रखने वाले चुनावी मैनेजमेंट गुरु भी अंदाजा नहीं लगा पा रहे हैं कि उनके देश-प्रदेश के कितने लोग कहां-कहां हैं और इनकी तादाद कितनी है। बेरोजगारी, भुखमरी और मंहगाई ने क्यों इनकी मट्टी से इनको दूर कर दिया ! क्यों गांव छोड़कर ग्रामीण शहरों को पलायन करता रहा !

चलिये ठीक है इसपर किसी सरकार ने कभी फिक्र नहीं की, ये इतनी बड़ी बात नहीं। क्योंकि अक्सर सरकारें ज़रूरी मुद्दों को भुलाती रही हैं। सबसे बड़ा आश्चर्य ये है कि किस प्रदेश के लाखों ग्रामीण किस प्रदेश के शहरों में पलायन कर गये.. पलायन करके प्रदेश छोड़ने वालें कहां गये.. इनकी कितनी संख्या है !

सरकारों के पास ऐसा कोई आकड़ा ही नहीं तो इनके कष्टों को दूर करने का कुशल प्रबंधन कैसे किया जायेगा ! यही कारण हैं कि समाज का विशाल वर्ग गरीब मजदूर, श्रमिक, कामगार हमेशां सप्राइज देने वाला सप्राइजिंग मैन भी होता है। अकसर राजनीतिक पार्टियां चुनावी जीत के बाद कहती नजर आती हैं कि इतनी सीटें मिल जायेंगी ये उम्मीद नहीं थी..इतने ज्यादा वोट मिलेंगे ये अंदाजा ही नहीं था।

उम्मीद से ज्यादा झोली भरने वाला समाज का सबसे विशाल वर्ग कोई और नहीं यही गरीब मजदूर वर्ग ही होता है। ये गरीब सियासतदाओं को सत्ता की नेमत से अमीर कर देता है। वो अलग बात है कि लोग कहते हैं कि मजबूर हैं मज़दूर। लाचार हैं, भूखे, प्यासे हैं। पैरों में फफोले पड़ गये इनके। जानवरो से बद्तर हालत है इनकी। भेड़-बकरियों की तरह चले जा रहे हैं। कीड़े/मकोड़ों की तरह कुचल रहे हैं, गाड़ियों के नीचे कट-मर रहे हैं।

फिर भी इन्हें कमज़ोर कहने की हिमाकत मत करना। ये भारत की ताकत हैं। ये भारत की आत्मा हैं। ये भारत की जीडीपी हैं। ये भारत की अर्थव्यवस्था है। ये देश की आन-मान और शान है। ये शहर ही नहीं बनाते, ये हुकुमतें भी बनाते हैं। इनकी मौजूदा भीड़ सरकारों की नालायक़ी ही नहीं ज़ाहिर करती, कभी ये भीड़ बनकर किसी रैली के जनसमर्थन की दलील भी बनते रहे हैं। रैलियों को हिट एंड फिट करने के लिए इन्हें अनफिट बसों/ट्रकों में लाये जाने की पुरानी रवायत है।

वो बात अलग है कि जिन शहरों को ये बनाते है कोरोना महामारी के बुरे वक्त ने उन शहरों और उनके शहरियों ने इन्हें मरने छोड़ दिया। जिन राजनीतिक दलों को ऐसे गरीब मजदूरों, श्रमिकों और मेहनतकश कामगारों ने अप्रत्याशित समर्थन दिया उन सत्तानशीनों ने भी इनकी परवाह नहीं की।

लेकिन हर दौर के सत्ताधारी जो कहते थे- अंदाजा ही नहीं था इतनी सीटें मिलेंगी..अंदाजा ही नहीं था कि इतने वाट मिलेंगे..

उन सत्तानशीनों को समझना होगा कि गरीब विशाल वर्ग ही विश्वास करने पर आ जाये तो उम्मीद से ज्यादा वोटों से झोली भर देता है। पर जब विश्वास के साथ विशवासघात हो तो ये अपनी ताकत का अंदाजा भी दिखा देता है। टूटे शीशे की तरह धारदार और नुकीला हो जाता है। इसलिए पत्थर जैसे शरीर और शीशे जैसे दिल वाले इन गरीब मजदूरो़ को शीशे की तरह जो नहीं संभाल पाया वो पछताता है। हमेशां ये हुआ है।

– नवेद शिकोह

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