कश्मीर की ज्वलंत समस्या का, क्या समाधान होगा ?

सन 1947 में भारत -पाकिस्तान को आजादी मिली । भारतीय स्वतंत्रता एक्ट 1947 के अनुसार उन तमाम रियासतों को यह चयन की सुविधा दी गई कि वे भारत के साथ रहना चाहते हैं या पाकिस्तान के साथ। उस समय कश्मीर देश की सबसे बड़ी रियासत थी । इस रियासत पर महाराजा हरि सिंह शासन करते थे ।

वहाँ की बहुसंख्यक मुस्लिम आबादी के कारण पाकिस्तान को यकीन था कि यह रियासत उनके साथ जायेगी, लेकिन हरि सिंह अपने राज्य को न तो पाकिस्तान में और न ही भारत में मिलाना चाहते थे लिहाजा हिन्दुस्तान-पाकिस्तान बटवारे के बाद भी वह स्वतंत्र राज्य के रूप में रहना चाहते थे । कश्मीर को वह ‘पूर्व का स्विट्जरलैंड’ बनाने का उनका सपना था लेकिन उनके सपनों को पाकिस्तान ने तोड़ दिया । जूनागढ़ से कश्मीर की तुलना अज्ञानी लोग कर रहे हैं जो गलत है।

जूनागढ़ की जनता ने रायशुमारी के बाद भारत में रहने का फैसला किया था । कश्मीर में ऐसा नहीं हुआ जब भारतीय सेना कश्मीर में दाखिल हुई तो तत्कालीन कश्मीरी नेता शेख अब्दुला ने मुद्दे पर जनमत संग्रह कराने का समर्थन किया था ।

संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद द्वारा युद्ध विराम संधि की अलग व्याख्या होने से भारत-पाक संतुष्ट नहीं थे । बहरहाल नवम्बर 1948 में दोनों देश जनमत संग्रह को राजी हुए । बाद में भारत ने इससे किनारा कर लिया और कहा कि पहले पाकिस्तान अपनी सेनाएँ कश्मीर से हटाए ।
कश्मीर को लेकर पहले नेहरू और पटेल के विचार समान नहीं थे । नेहरू कश्मीर के भारत में विलय के पक्ष में थे और पटेल कश्मीर के पाकिस्तान में विलय के विरुद्ध नहीं थे ।

जूनागढ़ हिन्दू बाहुल्य मुस्लिम शासित राज्य था और कश्मीर मुस्लिम बाहुल्य हिन्दू रियासत थी । पाकिस्तान ने कश्मीर को हड़पने के लिए कबायली हमला बोल दिया इसमें कबायली के रूप में पाकिस्तान सेना शामिल थी । राजा हरि सिंह इस हमले को झेलने में असमर्थ थे । फलस्वरूप 26 अक्टूबर 1947 को कश्मीर जनता की रज़ामंदी के बिना “इस्ट्ररूमेंट आफ एक्सेंशन ” पर हस्ताक्षर किया ।

लेकिन कश्मीर का भारत में रहना वहाँ की आम जनता के विरोध के कारण मुश्किल था । यही वह हालात थे जिससे कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा मिला और धारा 370 लागू हुआ ।

कश्मीर से विशेष धारा 370 व 35 ए समाप्त करने के बाद कश्मीर की जनता में ही नहीं, भारत में भी कई प्रकार की आशंकाएं है।
अब सरकार के ऊपर है कि वह उन सभी आशंकाओं को दूर करे जो कश्मीर में ही नहीं,पुरे भारत में मंडरा रही है । सरकार ने जो नया नैरेटिव रचा है उसे व्यापक अर्थो में भी देखा जा रहा है ।

कहा जा रहा है कि देश की अर्थ व्यवस्था बिगड़ी हुई है आटोमोबाइल सेक्टर में भारी मंदी के कारण टाटा ,महेन्द्रा जैसे आटोमोबाइल निर्माता कंपनियों ने अपना उत्पादन घटा दिया है।

देश की बैंको की हालत खस्ता हो रही है, बेरोजगारी बढ़ रही है देश की अन्य कंपनियों में भी उत्पादन घट रहा है । अब तो केंद्रीय बैंक ने भी मंदी की बात मान ली है । देश के कुछ उद्योग पति अर्थ व्यवस्था की हालत पर चिंता जता चुके हैं । मेक इन इंडिया,कौशल विकास काय॔क्रमो का जनता को समुचित लाभ न मिलना अर्थ व्यवस्था की कटु सच्चाई है । नोट बंदी के बाद भी देश से आतंक वाद समाप्त नहीं हुआ है । क्या कश्मीर से 370 व 35 ए हटाने के फैसले से आतंक वाद समाप्त हो जायेगा ? अब तो आशंका यह भी है कि एक देश का अर्थ कहीं हिन्दू राष्ट्र तो नहीं हैं ?

–नरेश दीक्षित

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