ये विकास दुबे था कानपुर वाला….

मैं किसी भी तरह से कभी भी अपराधी माफिया के महिमा मंडन के पक्ष में नहीं रहता। कुख्यात विकास दुबे और उसके गिरोह का अंत हो गया। अच्छा हुआ, होना ही चाहिए। अपराधी किसी का नहीं होता। अपने परिवार का भी नहीं। यहां तक कि खुद का भी सगा नहीं होता। कुछ लोग यूपी पुलिस एसटीएफ की कार्य प्रणाली से सहमत नहीं होंगे लेकिन जो लोग पुलिस के सिस्टम को जानते हैं वो जान रहे थे कि बिकरू कांड के बाद विकास दुबे और उसके गिरोह का अंत यही होना था, ऐसे ही होना था।

क्योंकि अपने देश के भ्रष्ट जूडिशियरी सिस्टम के चलते अपराधी माफिया बच निकलते हैं। इसलिए जिस तरह का भीषण कांड विकास गिरोह ने अंजाम दिया था उसके बाद से पुलिस के अंदर आक्रोश था और सब जानते थे कि विकास और उसके गिरोह को पकड़ कर कोर्ट में दाखिल भी कर दिया तो भले ही कोर्ट उन्हें फांसी की सजा सुनाता मगर उसमें समय लगता और हो सकता है कि माफिया के वकील कानूनी दांव-पेंच खेल कर सजा टलवाते रहते जिसके चलते पुलिस का मनोबल टूटता रहता और सरकार की नीयत पर भी उंगलियां उठती रहतीं।

माफिया जेल के अंदर से भी अपना भय का कारोबार चलाते हैं ये सब जानते हैं। नतीजा क्या होता विकास और उसके गुंडों का मनोबल बढ़ता और समाज में इसका गलत मैसेज जाता। युवाओं के अंदर अपराधी माफिया को लेकर बढ़ रहा आकर्षण और बढ़ता। अब सीधा संदेश है कि अपराधी कानून का सहारा लेकर बच नहीं सकते।

अब इसके दूसरे पहलू पर चर्चा हो जाय। इस पूरे प्रकरण ने पुलिस का मनोबल तो बढ़ाया है मगर इसके साथ ही खतरा भी बढ़ा है। ये खतरा है सरकार के संरक्षण और जनता के टैक्स के पैसे से पलने वाले आधुनिक हथियारों से लैस पुलिस गिरोह के बेअंदाज हो जाने का। सिस्टम का हिस्सा होने के नाते पुलिस के पास असीमित अधिकार हैं, शक्तियां हैं। बिकरू कांड के बाद पूरे देश की सहानुभूति पुलिस के साथ है लेकिन पुलिस दूध की धुली नहीं है।

विकास जैसे अपराधियों को पाल-पोस कर माफिया बनाने का काम भी यही पुलिस करती है। सोचिए कि अगर बिकरू में पुलिस वालों की जगह अगर विकास गिरोह ने आम जनता के बीच के लोगों की सामूहिक हत्या की होती तो करता पुलिसिया कार्रवाई यही रही होती जो इस कांड के बाद हुई। नहीं….। मीडिया में कुछ दिनों तक हो हल्ला होता। विकास दुबे गिरोह हो सकता है पुलिसिया संरक्षण में ही तमाम प्रकार से गिरफ्तार होता या कोर्ट में सरेंडर कर जाता। और उसे पुलिस का संरक्षण तो था ही। संतोष शुक्ला की हत्या के मामले में तो पुलिस वाले ही गवाही से मुकर गए।

क्या होना चाहिए अब। पूरे सिस्टम को इससे सबक लेना चाहिए। पुलिस को चाहिए कि अब किसी भी तरह से किसी भी वजह से अपराधी माफिया से गठजोड़ न करें। अपराधी किसी का नहीं होता। जूडिशियरी को चाहिए कि अपराधी माफिया के साथ पुलिस की कड़ी कार्रवाई पर त्वरित न्याय उपलब्ध कराए। किसी भी तरह से अपराधी को जूडिशियरी के लूप होल का फायदा नहीं मिलना चाहिए। और राजनीति को क्या कहें। ये लोग तो सरकार हैं। देश चलाते हैं। राजनीतिक पार्टियों को चलाने वाले लोग सिर्फ चुनाव जीतने के लिए किसी भी तरह से अपराधी माफिया को आम जनता कार्यकर्ता पर तरजीह न दें।

अंत में सबकुछ जानते समझते हुए भी बड़े परिप्रेक्ष्य में मैं अपराधी माफिया के मारे जाने के तरीके पर उंगली नहीं उठाऊंगा। पुलिस की पीठ भी नहीं ठोकुंगा। हां, सूबे के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को साधुवाद कि उन्होंने अपराधी माफिया के खात्मे के लिए दृढ़संकल्प दिखाया। उनकी जगह कोई और मुख्यमंत्री होता तो शायद अपराधी को सजा तो मिलती मगर इस तरह डंके की चोट पर नहीं मिलती जिससे समाज में मैसेज जाय। मुख्यमंत्री का ध्यान फिर इस ओर दिलाना चाहुंगा कि अब पुलिस को टाइट करें। एसटीएफ को भंग करें। नहीं तो ये भस्मासुर बन जाएंगे।

— राजीव तिवारी ‘बाबा’

(लेखक यूपी के मान्यता प्राप्त स्वतंत्र पत्रकार हैं, ये उनकी निजी विचार हैं)

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