सोनिया गांधी का मजदूर प्रेम सियासी सेलेब्स का हिस्सा बनेगा

कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी ने देश के मजदूरों-श्रमिकों की घर वापसी का किराया वहन करने का फैसला करके बहुत कुछ स्पष्ट कर दिया। ये कि वो एक परिपक्व विपक्ष की नेत्री हैं और कांग्रेस को मजधार से निकाल सकती हैं। कांग्रेस अध्यक्षा ने वैश्विक महामारी के इस कठिन वक्त में विपक्ष की सकारात्मक भूमिका अदा करते हुए सत्ता को उसकी चूक को आईना भी दिखा दिया।

सिर्फ पॉजिटिव नजरिये से देखिये तो ये बात जाहिर कर दी कि विषम परिस्थितियों में देश को बचाने के लिए सत्ता पर ही सारी जिम्मेदारियों का बोझ नहीं डाल देना चाहिए है। विपक्ष और जनता की भी जिम्मेदारी बनती है कि सब मिलकर देश की अहम जरूरतों का आर्थिक सहयोग करें।

कांग्रेस के इस फैसले को सियासी एंगल से देखिये तो ये फैसला सियासी दिखेगा। और हो भी क्यों ना, सियासी पार्टी में सियासत नजर आना स्वाभाविक है। और लोकतांत्रिक व्यवस्था का ढांचे में सियासत का शिल्प भी लोकहित मे तैयार किया गया है। यानी आपको सियासत करने के लिए जनता का विश्वास जीतना पड़ेगा।

जिसके लिए सिर्फ बातों और वादों से ही नहीं जमीन पर उतर कर काम करना पड़ेगा। यदि सत्ता मे हैं तो काम करना है, और विपक्ष मे हैं तब भी जनहित के लिए समर्पित और सक्रिय रहना है। जो जरुरी काम सरकार नहीं कर रही वो काम विपक्ष दबाव बना कर करवा ले।

सरकार विपक्ष की मांग या दबाव को नजरअंदाज कर दे तो सदन में या सड़क पर उतर कर जनहित के काम करवाये जायें। और यदि फिर भी सरकार काम नहीं कर रही और ये काम विपक्ष कर सकता है तो विपक्ष वो काम करके जनता का दिल जीत सकता है। इस तरह विपक्ष सत्ता पक्ष को आईना भी दिखा सकता है। लोकतांत्रिक व्यवस्था ने सत्ता और विपक्षी दलों को होटल का वेटर जैसी जिम्मेदारी दी है। जो जितनी अच्छी सेवा करेगा उतना ज्यादा उसे मेवा मिलेगा।

वेटर्स की सर्विस के ऊपर भी ये डिपेंड करता है कि रेस्टोरेंट या होटल कैसा है। हर वेटर अच्छी से अच्छी और ज्यादा से ज्यादा सर्विस देना चाहता है। होटल मैनेजमेंट की ये एक खूबी है कि उसकी पॉलिसी कामचोर और लापरवाह वेटर को भी खुद बा खुद कर्मठ और सक्रिय वेटर बनने पर मजबूर कर देता है।

वेटर अपने काम से अधिक काम करना चाहता है। बेहतर से बेहतर सेर्विस देना चाहता है। क्योंकि वो जितना ज्यादा और जितना बेहतर काम करेगा उसे उतनी ही ट्रीट यानी एक्सट्रा आमदनी का आर्थिक लाभ होगा। इसलिए होटल प्रबंधन ने ट्रीट सिस्टम को अपने कायदे- कानून में शामिल रखा और मान्यता दी। होटल प्रबंधन ने शायद ये तरीका लोकतांत्रिक व्यवस्था से सीखा।

देश-दुनिया कोविड 19 की महामारी से पस्त है। विकसित देशों की भी आर्थिक रीढ़ टूटती दिख रही है। सबसे बड़ी आबादी वाले विकासशील भारत पहले से ही आर्थिक सुस्ती मे बहाल था। ऐसे में कोरोना महामारी ने भारत की आर्थिक व्यवस्था को चरमरा दिया। यहां की आधी आबादी मजदूर या मजदूर स्तर का काम कर रोज खाती और रोज कमाती है। लॉकडाउन ने सबका काम और आमदनी बंद कर दी है।

सरकार मजदूरों की इतनी बड़ी आबादी को जिन्दा रखने के लिए इनके खाने का इंतजाम करने में कोई कसर नहीं छोड़ रही है। ऐसे में सरकार को सरकारी खजाने का धनाभाव का भी अहसास होगा। इसीलिए देश के मजदूरो़ की घर वापसी के लिए स्पेशल ट्रेनों का इंतजाम तो सरकार ने कर दिया लेकिन यात्रा भत्ता फ्री नहीं किया। बस यहीं कांग्रेस ने एक अच्छे वेटर की तरह गरीब मजदूरो- श्रमिकों के यात्रा भत्ता सहन करने की सर्विस देकर जनविश्वास की ट्रीट हासिल करने का कदम उठा लिया।

– नवेद शिकोह

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