नीब करौरी बाबा की अनंत कथाएँ: भोग अर्पण करने के लिये जो कटोरदान खोला तो देखा कि वहाँ कुछ भी न था!

नीब करौरी बाबा की अनंत कथाएँ: भोग अर्पण करने के लिये जो कटोरदान खोला तो देखा कि वहाँ कुछ भी न था!

शान्ता जी की माँ जब भूमियाधार बाबा जी महाराज के दर्शनों को आती थीं तो कुछ न कुछ भोग प्रसाद अवश्य लाती थीं, और यह भोग प्रसाद होता था घर में उस दिन तैयार दाल, चावल, सब्जी, रोटी या कोई कुमाऊँनी व्यंजन । उसी को ये एक ही कटोरदान-नुमा बर्तन में भरकर ले आती थीं । कभी अर्थाभाव अथवा कभी सवारी गाड़ी के न मिल पाने के कारण पैदल ही ८-१० किमी० चलकर भी आ जाती थीं ।

एक दिन ऐसे ही कारणों से वे पैदल आ रही थीं भूमियाधार को कि व्रत के कारण थकी माँदी वे मार्ग में एक शिला पर बैठ गईं । और वहीं उनके मन में विचार उठने लगे कि, “क्या ले जा रही हूँ मैं महाराज जी के लिये ? कितना-कितना, कैसा कैसा दिव्य भोग-प्रसाद लाती हैं अन्य - माइयाँ । सबके सामने कैसे दूँगी अपना ये भोग मैं महाराज जी को ?”

और फिर कुछ देर बाद चल दीं भूमियाधार को । दर्शनों के बाद जब कुछ एकान्त-सा मिला तो बाबा जी को अर्पण करने के लिये जो कटोरदान खोला तो देखा कि वहाँ कुछ भी न था !! बहुत परेशान हो गईं मन में कि आखिर प्रसाद गया कहाँ ? न तो कटोरदान कहीं खुला और न कहीं उलटा । तभी महाराज जी मुस्कुरा कर बोल उठे, “दुःखी क्यों होती है ? हमने तेरा प्रसाद वहीं पा लिया था जहाँ तू शिला के ऊपर बैठी थी !!"

गरीब नवाज़ बाबा जी की दीनवत्सलता !!

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