नीब करौरी बाबा की अनंत कथाएँ: गंदे नाले में नहाने को बोले जा सरयू में स्नान कर ले!

नीब करौरी बाबा की अनंत कथाएँ: गंदे नाले में नहाने को बोले जा सरयू में स्नान कर ले!

लटूरी बाबा के आश्रम से अदृश्य कर महाराज जी मुझे जंगल में एक नहर के किनारे ले जाकर वहाँ पैरापेट पर बैठ गये । बैठे बैठे काफी समय बीत गया । इस बीच मुझसे अपना बज्र-सम सीना भी मलवा चुके । ब्राह्म बेला आ चुकी थी। नहर में गँदला पानी बह रहा था। मैं यही देख रहा था कि तभी महाराज जी ने मुझसे कहा, “पूरन, सरयू में स्नान कर लो ।”

आज्ञानुसार मैंने उसी गँदले पानी की नहर में डुबकी लगा कमीज से बदन पोंछ लिया । परन्तु मन ही मन सोचता रहा, "यह कैसी सरयू है ?” स्नान के बाद महाराज जी को दंडवत प्रणाम करने लगा तो बोल उठे, “पूरन, सरजू स्नान कर तुम निर्मल हो गये”, और फिर गा उठे, “तहंहि अवध जहँ राम निवासू ।”

महाराज जी से यह संकेत पाकर कि जहाँ राम तहीं ही अवध और तहीं ही सरयू भी !! मैंने उन्हें पुनः दण्डवत प्रणाम किया (पूरनदा) गद्गद होकर।

(उक्त घटना के संदर्भ में मुझे भी उत्तरकाण्ड का वह प्रसंग याद हो आया जहाँ श्री राम पुष्पक में चढ़े विभीषण-अंगदादि को उस अवध की महिमा सुना रहे हैं जहाँ उनका जन्म होता है (भक्त का हृदय)- जहाँ वे वास करते हैं जहाँ ही विवेक की सरजू बहती है जहाँ ही उनकी सुख-राशि धामदापुरी है - है. (बैकुण्ठ नहीं) और तब राम जी से यह संकेत पाकर सबने उसी अवध (भक्त-हृदय) को धन्य धन्य कहा ‘धन्य अवध जो राम बखानी' - लेखक)

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