नीब करौरी बाबा की अनंत कथाएँ: लंदन में एक महिला को बस पर बैठे दिखना और फिर ग़ायब हो जाना

नीब करौरी बाबा की अनंत कथाएँ: लंदन में एक महिला को बस पर बैठे दिखना और फिर ग़ायब हो जाना

महाराज जी ज्ञात-अज्ञात रूप में न मालूम किन किन स्थानों देश-विदेश में भी प्रगट होकर अपनी कल्याणमयी लीलायें करते रहते थे । कहते भी तो रहते थे कि, “तुम अपने दो चार लड़कों से ही परेशान रहते हो । तुम करते रहो हाय मेरा मुण्डा, हाय मेरा चुण्डा । मेरा तो सारा विश्व है हजारों लाखों लड़के हैं। हम नहीं होते परेशान ।” - उक्त कथन के संदर्भ में दुष्टात रूप में एक लीला एक अमेरिकन महिला, श्रीमती हीथर थॉम्पसन से सम्बन्ध रखती है। लंदन में वे जब एक बस में यात्रा कर रही थी तो एक बस स्टाप पर एक बूढ़ा भिखारीनुमा व्यक्ति बस में चढ़ गया जिसके बगल में एक लाल-नीला खानेदार बिनावट लिये कम्बल भी दबा था ।

केवल अपनी मनोहारी मुस्कान द्वारा ही, बिना कुछ बोले उस वृद्ध ने, मानो, इस महिला से कुछ खिसक कर अपने बैठने भर की जगह के लिये अनुरोध किया । बूढे की आयु और उसकी वह मधुर मुस्कान देखकर श्रीमती थॉम्पसन मुग्ध हो उठीं और कुछ खिसककर बूढे व्यक्ति को बैठने की जगह दे दी।

सभ्यता की सीमा के भीतर बंधी महिला ने उन वृद्ध की तरफ पुनः देखना उचित न समझा, पर उनकी वह मुस्कान वे भूल न सकीं। तभी एकाएक इनको (न मालूम किस प्रेरणावश) याद हो आया कि अपने मित्रों से वे सदा यही सुनती रहती थीं कि भारत के एक महान संत, (महाराज जी) भी सदा एक कम्बल ओढ़े रहते हैं, और कि उनकी मुस्कान बहुत मनोहारी होती है। यह विचार आते ही उन्होंने मुड़कर इस वृद्ध को तुलनात्मक दृष्टि से देखना चाहा पर तब वहाँ उस सीट पर कोई भी न था!! ये आश्चर्यान्वित हुई सोचती रह गईं कि वेग से चलती बस से ये वृद्ध महाशय कब-कैसे उतर गये ।

अब इस महिला के अन्तर में यह विश्वास घर कर गया कि हो न हो ये वृद्ध महाशय महाराज जी ही थे, और भारत जाकर महाराज जी के दर्शन कर पाने की इनकी अभिलाषा दिन पर दिन उत्कट होती चली गई।

पर इनके पास इतना द्रव्य न था कि वे यह यात्रा कर पाती । घट घट की जानने वाले महाराज जी ने तभी इनके मित्रों आदि को प्रेरित कर इनके लिये समुचित द्रव्य की व्यवस्था भी सम्पन्न करा दी, और शीघ्र ही इन्हें भी कैंचीधाम में अपने समक्ष उपस्थित करवा लिया ।

दर्शन के समय इन्होंने पाया कि महाराज जी वही कम्बल ओढे हैं जो लंदन में बस में उनकी बगल में दबा था - वही लाल-नीला रंग और वही बिनावट !! और पुष्टि-रूप वही मुस्कान बिखेर कर महाराज जी ने महिला की तुष्टि भी कर दी कि, मैं ही तो था तुम्हारे साथ बस में उस दिन !!

(अलौकिक यथार्थ)

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