नीब करौरी बाबा की अनंत कथाएँ: जब इलाहाबाद के कलेक्टर मिलने आए और महाराज जी बंद कमरे से ग़ायब!

नीब करौरी बाबा की अनंत कथाएँ: जब इलाहाबाद के कलेक्टर मिलने आए और महाराज जी बंद कमरे से ग़ायब!

श्री जे० एन० उग्र तब इलाहाबाद में कलेक्टर थे । वे अक्सर प्रभुदत्त ब्रह्मचारी जी के पास आया करते थे । ब्रह्मचारी जी से बाबा महाराज के बारे में जब-तब सुनते उग्र जी को भी बाबा जी के दर्शनों की उत्कट अभिलाषा हो चली । और एक दिन उनकी इस इच्छा पूर्ति हेतु बाबा जी ब्रह्मचारी जी के आश्रम पहुँच ही गये ।

ब्रह्मचारी जी ने तत्काल उग्र जी को सूचना भिजवा दी । परन्तु उनके आश्रम पहुँचने में तो आधा-पौन घंटा लग जाना स्वाभाविक था और बाबा जी को इतनी देर रोक पाना सम्भव भी तो न होता । अस्तु, ब्रह्मचारी जी बाबा जी को एक कमरे में उठा ले गये और उन्हें वार्ता में उलझाये रखा ।

साथ में खातिर-तवाजो भी करते रहे । बाबा जी समझ तो गये ही थे स्वयं भी बैठे रहे । पौन घंटे बाद एक शिष्य ने आकर उग्र जी के आने की सूचना दी तो उन्हें लिवाने ब्रह्मचारी जी शिष्य को वहीं पहरे में छोड़ कमरे से बाहर आ गये और कुछ आगे बढ़ गये।

परन्तु जब क्षणों बाद उग्र जी को लेकर ब्रह्मचारी जी कमरे में पहुँचे तो पाया कि बाबा जी वहाँ हैं ही नहीं !! कहाँ गये ? शिष्य से पूछा तो शिष्य ने भी कहा कि उसने तो उन्हें बाहर निकलते नहीं देखा । कमरे में कोई खिड़की भी तो न थी (बाहर निकलने को !!) और कुछ ही दूर पर ब्रह्मचारी जी ने भी कुछ नहीं देखा था ऐसा ।

तभी सबने देखा कि महाराज जी मुस्कुराते हुए अन्य मार्ग से उनकी तरफ चले आ रहे हैं !! उग्र जी के लिये इतना ही पर्याप्त था महाराज जी का रूप समझ पूर्ण रूपेण उनका चरणाश्रित हो जाने हेतु । लीला भी तो अपने इस पूर्वकालिक चरणाश्रित को पुनः इस जीवन में अपने कृपा-क्षेत्र में प्रविष्ट कराने हेतु ही थी— न कि अपनी शक्ति प्रदर्शन हेतु। (केहर सिंह)

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