नीब करौरी बाबा की अनंत कथाएँ: सोने-चाँदी के बर्तनों में प्रसाद के बाद ड्राइवर के घर जा रोटी खायी

नीब करौरी बाबा की अनंत कथाएँ: सोने-चाँदी के बर्तनों में प्रसाद के बाद ड्राइवर के घर जा रोटी खायी

कानपुर के एक बहुत बड़े उद्योगपति की माता जी ने महाराज जी से कई बार आग्रह किया था कि, “हमारे घर प्रसाद पायें ।” महाराज जी उनका अनुरोध टालते रहते थे परन्तु एक दिन उन्होंने हामी भर दी इसके लिये और कह दिया, “गाड़ी मत भेजना, हम अपने आप आ जायेंगे ।” दूसरे दिन वे अकेले ही ड्राइवर बृजलाल के साथ उन माता जी की कोठी पर पहुँच गये ।

मारवाड़ी उद्योगपति के घर चाँदी-सोने के पात्रों में तरह तरह के व्यंजन युक्त भोजन को देखकर बाबा जी का विरागी मन वैसे ही विचलित हो गया था, और शायद, गृहस्वामिनी के मन में भी ऐसे पात्रों में विविध प्रकार के व्यंजन अर्पण करते वक्त कुछ दूसरा भाव आ गया हो, (अहंकार का ।)

बाबाजी महाराज का भगत यह ड्राइवर कुछ न बोला। (वैसे भी वह क्या समझता कि बाबा जी क्यों भूखे रह गये ?) तब उसके घर जाकर बाबा जी ने रोटी खाकर अपनी तृप्ति की !!

कुछ ही क्षणों के भीतर बाबा जी ने एक पात्र के व्यंजन को दूसरे पात्रों में मिलाना प्रारम्भ कर दिया। गृहस्वामिनी कहती रह गई, "अरे महाराज ! यह तो खट्टा था, यह तो नमकीन था, मीठा था" - आदि आदि और बाबाजी ने सभी व्यंजनों का घोल-मतोल बना प्राप्त कर लिया !! गृहस्वामिनी अपनी मेहनत से बने व्यंजनों की यह दशा देख हतप्रभ खड़ी रह गई और उधर कार ड्राइवर ने वही व्यंजन एक एक कर पूरा स्वाद लेकर पाये ।

कुछ देर रुककर बाबा जी बाहर आ गये और कार में बैठ लिये । फिर कुछ दूर जाकर ड्राइवर से बोले, “बृजलाल, हम तो भूखे रह गये । चल तेरे घर चलते हैं ।" ड्राइवर चकित रह गया कि अभी तो बाबाजी ने मेरे सामने भरपेट भोजन किया है, फिर यह भूख कैसी ? पर बाबाजी महाराज का भगत यह ड्राइवर कुछ न बोला। (वैसे भी वह क्या समझता कि बाबा जी क्यों भूखे रह गये ?) तब उसके घर जाकर बाबा जी ने रोटी खाकर अपनी तृप्ति की !!

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