नीब करौरी बाबा की अनंत कथाएँ: वृन्दावन आश्रम में स्थल चयन

नीब करौरी बाबा की अनंत कथाएँ: वृन्दावन आश्रम में स्थल चयन

श्री वृन्दावन धाम में महाराज जी ने केवल हनुमान मंदिर एवं आश्रम की स्थापना करवाई थी और अपने जाने से पूर्व वृन्दावनेश्वरी देवी के प्रतिष्ठापन की व्यवस्था भी कर दी थी । परन्तु वृन्दावन आश्रम के भीतर पूर्व में कभी भी देवी अनुष्ठान नहीं करवाया था

वर्ष १९७३ (मार्च माह) में बाबा जी श्री देवकामता दीक्षित जी को साथ लिये आश्रम के प्रांगण में घूम रहे थे। बाबा जी कहीं न कहीं तो आसन ग्रहण करेंगे ही। यही सोचकर दीक्षित जी अपनी बगल में एक छोटा-सा चटाई-आसन भी दबाये थे। कुछ देर बाद बाबा महाराज कुछ रुक रुक कर बोलने लगे (मानो अपने से ही) – “कहाँ बैठँ ? कहाँ बैठँ ?” और फिर (कुछ जोर से लल्लू दादा से)- “बोलते क्यों नहीं कहाँ बैठूँ ?”

लल्लू दादा की समझ में नहीं आ रही थी यह बात बरामदा भी था, और घास का मैदान भी था बैठने के लिये। तभी एक स्थान विशेष को इंगित कर बाबा जी स्वयं ही बोल उठे, “यहाँ बैठता हूँ ।” दादा ने वहीं चटाई बिछा दी, और बाबा जी भी कुछ देर बैठ कर वहाँ से उठ लिये।

और फिर वर्ष १९७३ की चैत्र की नवरात्रों में (अप्रैल महाराज जी ने आश्रम के प्रांगण में उसी उक्त स्थान में ही में आवासीय भवनों से लगभग १/३ भाग दक्षिण की ओर तथा श्री हनुमान १९७३ में) (जो उत्तर मंदिर की चहार दीवारी से २/३ भाग उत्तर की ओर स्थित है) अलीगढ़ के एक भक्त, श्री विशम्भर जी से ६ दिन का देवी-पूजन एवं हवन-यज्ञ करवा डाला !! और जब पूर्णाहुति हो गई तो बाबा महाराज ने उस स्थल-विशेष की यह कहकर घेराबन्दी करवा दी कि, "यह जगह अब शुद्ध हो गई है। इसे घेर कर सुरक्षित कर दो ।” बाबा जी के इस आदेश का अर्थ अथवा स्थल विशेष की घेराबन्दी का प्रयोजन तब केवल रहस्य- मात्र बन कर रह गया था ।

और जब ११ सितम्बर, १९७३ को वृन्दावन में भक्तों द्वारा यह निर्णय न लिया जा सका कि महाप्रभु का पार्थिव शरीर अन्तिम संस्कार हेतु कहाँ (जन्म स्थान अकबरपुर या हरिद्वार या वृन्दावन में जमुना किनारे) ले जाया जाये तब महाराज जी ने ही वृन्दावन के प्रसिद्ध योगी, पागल बाबा को प्रेरित कर आश्रम भिजवाया और उनके द्वारा अपने पार्थिव शरीर को आश्रम के प्रांगण में उसी स्थल-विशेष में ही पंचभूतों में विसर्जित कर देने हेतु आग्रहपूर्ण राय दिलवा दी जिसे उपस्थित भक्तों ने भी स्वीकार कर लिया, महाप्रभु की मंशा के अन्तर्गत ।

और फिर उसी शुद्ध किये गये स्थल में ही महाराज जी के लीला शरीर को अनन्त चतुर्दशी के पावन पर्व में अग्निदेव को समर्पित कर दिया गया तथा उसी स्थल पर ही महाराज जी का तत्व पीठ-रूप मंदिर भी उनकी मूर्ति को लिये खड़ा है जिसके दर्शन हेतु हजारों की संख्या में भक्तगण प्रति वर्ष आते हैं और यहीं ही बाबा जी महाराज की लौकिक पुण्य तिथि भी वृहद भण्डारे के साथ आयोजित होती है।

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