नीब करौरी बाबा की अनंत कथाएँ: भक्तों के भावों का सम्मान

नीब करौरी बाबा की अनंत कथाएँ: भक्तों के भावों का सम्मान

नैनीताल में पूरनदा को बड़ी इच्छा थी कि बाबा जी महाराज उनके घर (सिपाहीधारा) भी पधारें और प्रसाद ग्रहण करें परन्तु महाराज जी उनकी यह बात सदा टाल देते (यद्यपि बाद में हल्द्वानी में वे यदा-कदा पूरनदा के घर प्रसाद ग्रहण करने आ पहुँचते थे ।) कारण ? पूरनदा की (तबकी) माली हालत ।

बाबा जी को तो मालूम था कि वे जहाँ भी जाते हैं उनके साथ १०-१२ अथवा अधिक संख्या में भक्तगण भी पहुँच जाते हैं। कहाँ से करेगी पूरन की बहू सबके लिए प्रबन्ध ? पूरन को तो इन सब बातों का होश ही नहीं रहता कभी यही भाव रहता बाबा जी का । परन्तु भक्त की इस भावपूर्ण इच्छा का भी तो महाराज जी ने उसी भाव से सम्मान करना था ।

अस्तु, एक दिन वे पूरनदा को लेकर अकेले ही नैनीताल में पाषाण देवी के मंदिर पहुँच गये तथा झील के किनारे एक शिला पर बैठ गये । कुछ क्षण बाद बोले, “पूरन हमें भूख लगी है। घर से खिचड़ी बनवाकर ले आ ।” पूरनदा तत्काल सिपाहीधारा (११/४ मी०) को रवाना हो गये ।

और फिर डेढ़ घंटे बाद घर से खिचड़ी बनवाकर लौटे। ये डेढ़ घंटे महाप्रभु ने अकेले झील के किनारे केवल भक्त के भावों के आदर-सम्मान में शिला पर बैठकर बिता दिये !! और जब खिचड़ी आ गई तो उसे भी सारी की सारी प्रेम से प्राप्त कर ली ।

No stories found.
The News Agency
www.thenewsagency.in