नीब करौरी बाबा की अनंत कथाएँ: एक दिन यहाँ घी के दिये जलेंगे!

नीब करौरी बाबा की अनंत कथाएँ: एक दिन यहाँ घी के दिये जलेंगे!

अपने जाने के कुछ काल पूर्व बाबा जी ने श्री माँ से एकाएक कहा, “अम्मा, एक दिन यहाँ 'घी के दिये' जलेंगे।” बाबा जी की इस बात में छिपा रहस्य समझ में आ पाना दुरूह था, कारण कैंची धाम में बिजली की रोशनी पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध थी ही और महाराज जी ने भी स्वयं ही (कुछ काल के लिये बिजली के गुल हो जाने की अवस्था से निबटने हेतु) दर्जन से ऊपर लालटेनें और गैस बत्तियों की एवं प्रचुर मात्रा में मिट्टी के तेल की व्यवस्था करवा रखी थी आश्रम में।

पर किसको पता था कि घी के दिये जलने की लगन कब आयेगी और कि महाराज जी ने यह शुभ-पर्व अपने स्वयं के मूर्ति रूप में विराजने के साथ निश्चित किया है। वर्ष १९७६ – १५ जून का दिन । अत्यन्त हर्षोल्लास के मध्य महाराज जी मूर्ति रूप में श्री धाम कैंची में विराज चुके थे। एकाएक दोपहर बाद पास के बिजली पूरक ट्रान्सफार्मर में जोर की आवाज हुई और वह क्षतिग्रस्त हो गया। आश्रम सन्ध्याकाल में रोशनी विहीन हो गया । लालटेनें और गैस बत्तियाँ जल गईं ।

नन्दलाल जी की दुकान से लाये गये नेपाली घी के कुछ टिनों से पर बाबा महाराज को तो घी के दिये जलाने थे । उधर गोदाम में घी रिस कर बाहर बह चला था जिसे एक माँ ने समेट कर एक पात्र में जमा कर लिया था। तभी माँ को बाबा जी का कथन, 'घी के दिये जलेंगे' याद आ गया ।

तत्काल ही उन्होंने बड़े बड़े दियों में वह घी भरवा कर उसमें रुई की मोटी-मोटी ज्योतियाँ जलवा दीं, और उन्हें राम कुटी, राधा कुटी, बाबा जी महाराज के मंदिर के चारों ओर तथा ऊपर भी, एवं आश्रम-मार्गों में (जहाँ जहाँ बाबा जी विचरण करते थे) और पाँचों मंदिरों में एवं प्रवेश मार्ग में रखवा दिये ।

सारा मंदिर क्षेत्र एवं आश्रम एक अपूर्व दिव्य ज्योति से जगमगा उठा !! बिजली की रोशनी की चमक इस जगमग के समक्ष फीकी ही थी । महाराज जी का खेल दिया-भर घी भी अर्ध रात्रि से ऊपर भी पर्याप्त रहा !!

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