नीब करौरी बाबा की अनंत कथाएँ: कैसे अपने भक्त की नौकरी बचायी!

नीब करौरी बाबा की अनंत कथाएँ: कैसे अपने भक्त की नौकरी बचायी!

हाइडिल विभाग के श्री ईश्वरी प्रसाद अपने विभाग के ३६ नलकूपों की देखरेख हेतु ऐटा की एक तहसील में अमीन के पद पर नियुक्त थे । वर्ष १९७०-७१ में ही उन्हें बाबा जी के प्रथम बार दर्शन मिल पाये । पर तभी से वे बाबा जी के प्रति समर्पित भाव से जब-तब वृन्दावन आ पहुँचते।

एक दिन वे ऐसे ही भावपूर्ण हुए दर्शन हेतु वृन्दावन आश्रम आये तो बाबा जी ने उन्हें रोक लिया। दूसरे दिन ड्यूटी पर जाने को हुए तो बाबा जी ने उन्हें पुनः रोक लिया । और फिर इसी तरह ६-७ दिन रोके चले गये अपने पास ।

उधर उनके असिस्टेंट इंजीनियर को, (जो उनसे रुष्ट रहता था) एक सुनहरी मौका मिल गया उन्हें सबक सिखाने का। उसने इनकी चौथी गैर हाजिरी के बाद उनके खिलाफ एक लम्बी चौड़ी रिपोर्ट सुपरिंटेन्डिग इन्जीनियर के पास भेज दी कि किस तरह अमीन ईश्वरी प्रसाद लगातार बिना अर्जी, बिना आज्ञा-मंजूरी के अपने कार्य से अनुपस्थित हैं, और कितने नलकूप उनकी गैर हाजिरी के कारण बीमार पड़े हैं। आदि आदि । और भी कि, ऐसी ही गैर हाजिरी इनकी जब तब हो जाती है ।

परन्तु इधर बाबा जी भी देख रहे थे उसकी सब करतूत । अपने भक्त को वे कैसे असहाय छोड़ देते ? अपने चरणाश्रित की रक्षा हेतु तुरन्त क्रियाशील हो गये । प्रथम तो उन्होंने सुपरिंटेन्डिग इंजीनियर का ही दिमाग चला दिया कि (असिस्टेन्ट इंजीनियर की बातों पर पूरा यकीन न कर) इस तथ्य की सही जानकारी मैं स्वयं करूँगा । और वह अपनी जीप लेकर इन ३६ नलकूपों के मुआइने हेतु खुद चल दिया।

आश्चर्यान्वित हुए अमीन मूक ही बने रहे। परन्तु तब क्या उन्होंने सोचा भी होगा या विश्वास ही किया होगा कि बाबा महाराज उनकी रक्षा हेतु अमीन ईश्वरी प्रसाद बनकर उनकी ड्यूटी पूरी करते रहे !!

तब एक के बाद एक उन नलकूपों पर जब वह पहुँचा तो वहाँ तैनात कर्मचारियों से उसे मालूम हुआ कि अमीन आगे चले गये हैं और कुएँ के बारे में अपनी रिपोर्ट भी लिख कर अभी अभी (या कल ही परसों हीं) तो मुआइना कर (आवश्यकतानुसार) हिदायतें भी दे गये हैं।

कई नलकूपों पर इसी प्रकार की फुटकर रिपोर्ट मिलने-देखने पर सुप० इंजी० असिस्टेन्ट इंजीनियर पर ही क्रोधित हो उठा और उसे ही चार्जशीट दे दी ! और जब सातवें दिन ईश्वरी प्रसाद महाशय अपनी ड्यूटी पर हाजिर हुए तो २-३ दिन में ही उन्हें हर कुएँ पर एक ही तरह की बात सुनने को मिली अपने मातहतों से (सार में) “वाह सरकार, कैसा बढ़िया मुआइना हो गया आपका ।

और आप भी कैसी मुस्तैदी से साइकिल भगाते एक कुएँ से दूसरे कुएँ दौड़ते रहे इन दो-तीन दिनों में !! क्या आपको पहिले से मालूम हो गया था कि बड़े साब आयेंगे ?” आश्चर्यान्वित हुए अमीन मूक ही बने रहे। परन्तु तब क्या उन्होंने सोचा भी होगा या विश्वास ही किया होगा कि बाबा महाराज उनकी रक्षा हेतु अमीन ईश्वरी प्रसाद बनकर उनकी ड्यूटी पूरी करते रहे !! (अमीन ने अपने जीवन की यह महानतम घटना श्री केहर सिंह जी को स्वयँ सुनाई)

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