नीब करौरी बाबा की अनंत कथाएँ: महाराज जी मीलों दूर होती ध्वनि भी श्रवण करा देते थे

नीब करौरी बाबा की अनंत कथाएँ: महाराज जी मीलों दूर होती ध्वनि भी श्रवण करा देते थे

इलाहाबाद में (फरवरी १६७२) हेमदा के प्रयाग स्टेशन वाले बँगले में हम सब अखण्ड मानस पाठ में तन्मय थे उस वर्ष महाराज जी जाड़ों में हर वर्ष की भाँति) नहीं आये थे हम सब तड़प रहे थे उनके बिना और इस मानस पाठ द्वारा उन्हें प्रयाग खींचने का प्रयास था यह पाठ का दूसरा एवं अन्तिम दिन था, परन्तु आनन्दमय, संगीतमय होता यह पाठ पूर्ण न हो पा रहा था ।

रात के ६.३० बज चुके थे । तब पूर्ण होने के बाद ही आरती-पूजन हो पाया । प्रसाद वितरण हो ही रहा था कि दादा के घर उनका भाँजा, विभूति आ पहुँचा दादा को बुलाने “महाराज जी आ गये हैं !!" दादा और चाची जी भाग लिये तुरन्त और हम भी जल्दी जल्दी निवृत्त हो दर्शनों को भागे और तब उस महान आश्चर्यपूर्ण लीला का वर्णन प्रारम्भ हुआ श्री माँ द्वारा जो बाबा जी ने उन्हें दिखाई थी ट्रेन के फर्स्ट क्लास के डिब्बे में दक्षिण यात्रा से लौटती बेर मैहर स्टेशन से आगे रात्रि प्रारम्भ के समय पहुँची चलती ट्रेन में महाराज जी ने माँ से पूछा, “रामायण सुनेगी ?”

और ऐसा कह उन्होंने डिब्बे की खिड़की खोल दी । तभी बहुत मधुर समवेत स्वरों में उन्हें बाजे-गाजे के साथ जानी-पहिचानी-सी स्पष्ट आवाज में मानस पाठ का उत्तरकाण्ड सुनाई देने लगा !! (स्पष्ट है कि उस समय हमारा भी उत्तरकाण्ड प्रसंग चल रहा था ।) कौतूहलवश माताओं ने खिड़की के बाहर इधर-उधर देखा तो अन्धकार के सिवा कुछ न दिखाई दिया तब कहाँ से आ रही है यह ध्वनि ?

गाड़ी तेज गति से कई मील आगे बढ़ चुकी थी परन्तु पाठ अब भी स्पष्ट सुनाई देता रहा मानो पास में ही हो रहा हो !! तभी बाबा जी ने खिड़की बन्द कर दी, और पाठ की ध्वनि भी बन्द हो गई !! गाड़ी के कुछ मील और आगे बढ़ जाने पर महाराज जी ने पुनः खिड़की खोल दी पाठ की स्पष्ट ध्वनि सुनाई देना भी पुनः शुरू हो गया !!

तब माँ और जीवन्ती माँ एक दूसरे का मुँह देखने लगीं । खिड़की पुनः बन्द हो गई और पाठ भी पुनः लुप्त !! बाबा जी ने एक दो बार और भी यही खेल किया। इलाहाबाद आ गया तब दादा के घर पहुँचकर ही माँ तथा अन्य लोगों को पता चला कि वह मानस पाठ तो हेमदा के घर पर हो रहा था !!

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