नीब करौरी बाबा की अनंत कथाएँ: महाराज जी आदेश नहीं संकेत करते थे!

नीब करौरी बाबा की अनंत कथाएँ: महाराज जी आदेश नहीं संकेत करते थे!

सूक्ष्म तत्व की उपलब्धि हेतु गुरु शरण में जाना अत्यावश्यक है। तत्त्व दृष्टा तथा अनुभवी गुरु से प्राप्त विद्य न तो न्यून होती है और न नष्ट होती है। उपनिषद् चेतावनी भरे स्वर में घोषणा करते हैं- 'उठो, जागो और श्रेष्ठ पुरुष को प्राप्त कर तत्त्व को जान लो उपनिषदों में इस तत्त्व का स्पष्ट संकेत है कि हीन अथवा साधारण बुद्धि वाले पुरुष के द्वारा किये जाने वाले उपदेश के आधार पर सूक्ष्म तत्त्व का ज्ञान नहीं होता।

सूक्ष्म तत्त्व की उपलब्धि तो पुरुष के स्वतः पुरुषार्थ से ही होती है। ज्ञान का विषय अत्यन्त गूढ़ रहस्यमय एवं दुष्प्राप्य है। यह श्रवण प्रवचन और स्वाध्याय का विषय न होकर स्वानुभूति का विषय है। गुरु तो केवल संकेत मात्र करता है और साधक को इसकी प्राप्ति के लिए स्वयं अग्रसर होना पड़ता है।

छान्दोग्य उपनिषद् में एक दृष्टान्त आता है कि 'कोई चोर गान्धार के किसी व्यक्ति की आँखें बाँधकर ले जाये और निर्जन स्थान पर उसे छोड़ दे तब उसकी दुःख भरी वाणी से द्रवित होकर प्रभु कृपा से कोई उसके सम्मुख पहुँच जाये और उसके आँखों के बन्धन को खोल दे तथा गान्धार को जाने वाले मार्ग का संकेत करते दो वह व्यक्ति अपनी मेधा और पुरुषार्थ से एक गाँव से दूसरे गाँव को पूछता हुआ गान्धार देश में पहुँच ही जाता है।

अतः तात्पर्य यह है कि गुरु के संकेत मात्र से सुबोध शिष्य अपने गन्तव्य स्थल तक पहुँच ही जाता है और जो विवेकहीन होता है वह अन्धेरे कुएँ में मेढक की तरह पड़ा रहता है। गुरु की शरण के अतिरिक्त ज्ञान प्राप्ति का अन्य मार्ग नहीं है। गुरु की शरण और आज्ञा पालन से सत्यकाम को सच्चा ज्ञान प्राप्त हो गया था।

सन्तों की साधना प्रणाली और आत्म-ज्ञान के द्वार का उद्घाटन सन्तों के संकेतों में ही निहित है। सदगुरु देव नीबकरौरी बाबा भी ऋषि कोटि के सन्त थे, जो अपने भक्त साधकों को मात्र संकेत द्वारा ही आत्म-ज्ञान की दीक्षा दिया करते थे उनका समग्र जीवन ही शिष्य और भक्त के लिए एक आदर्शमय व्यावहारिक उपदेश था।

-होतृदत्त शर्मा, अहलादपुर

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